रात के 11 बज रहे थे। गर्मी इतनी तेज़ थी कि पसीना भी पसीना लग रहा था। मैं अपने कमरे में लेटा था, पंखा पूरे जोर से चल रहा था, पर हवा गर्म ही आ रही थी। बाहर अम्मा के कमरे से हल्की-सी आहट आ रही थी।
अम्मा… मेरी अम्मा।
47 साल की उम्र में भी उनकी सुंदरता कम नहीं हुई थी। गोरा-चिट्टा रंग, बड़े-बड़े स्तन जो हमेशा ब्लाउज में ठसाठस भरे रहते, और गांड… ओह अम्मा की गांड। इतनी गोल, इतनी मुलायम, इतनी भारी कि जब वो साड़ी बांधती थीं तो साड़ी की पल्लू के नीचे से भी साफ दिख जाती।
पापा की मौत को तीन साल हो चुके थे। घर में सिर्फ मैं और अम्मा। कोई और नहीं।
मैं रोज रात को उनकी गांड के बारे में सोच-सोच कर हस्तमैथुन करता था। आज भी वही कर रहा था। अपना लंड बाहर निकाला, जो पहले से ही सख्त था, और धीरे-धीरे सहलाने लगा। आँखें बंद करके अम्मा की गांड का ख्याल किया – कैसे वो नहाते समय साड़ी उतारती होंगी, कैसे उनकी गोल-गोल गांड के दोनों टुकड़े हिलते होंगे, कैसे उनकी गांड की दरार में पसीना जमा होता होगा…
“आह्ह…” मैंने धीरे से कराहते हुए लंड को तेज़ हिलाया।
इतने में अचानक अम्मा के कमरे का दरवाज़ा खुला।
“बेटा? सो नहीं रहा?”
मैंने झट से कंबल ओढ़ लिया। लंड अभी भी हाथ में था।
“हाँ अम्मा… गर्मी बहुत है।”
अम्मा दरवाज़े पर खड़ी थीं। हल्के गुलाबी नाइटी में। नाइटी इतनी पतली थी कि उनकी ब्रा के बिना स्तनों के निप्पल साफ दिख रहे थे। और नीचे… कोई पेटीकोट नहीं। सिर्फ नाइटी।
वो कमरे में आईं और मेरे बिस्तर के किनारे बैठ गईं।
“क्या बात है बेटा? आजकल बहुत उदास रहता है। कुछ परेशानी है क्या?”
उनका हाथ मेरे बालों में घूमने लगा। उनकी उंगलियाँ मेरे माथे पर, मेरे गाल पर… फिर मेरी गर्दन पर।
मैंने आँखें बंद कर लीं। उनका स्पर्श… इतना नरम, इतना गर्म।
“कुछ नहीं अम्मा…”
“झूठ मत बोल। मैं तेरी माँ हूँ। सब समझती हूँ।”
उनका हाथ नीचे सरक आया। मेरे सीने पर। फिर पेट पर।
मेरा लंड कंबल के नीचे फड़फड़ा रहा था।
अम्मा ने अचानक कंबल हटा दिया।
मेरा लंड सीधा उनकी आँखों के सामने खड़ा था। 7 इंच का मोटा, काला लंड, जिसकी नोक से पहले ही पानी टपक रहा था।
अम्मा की साँस अटक गई।
“बेटा… ये… ये क्या है?”
“अम्मा… मैं… मैं रोक नहीं पा रहा…”
अम्मा चुपचाप मेरा लंड देखती रहीं। उनकी आँखों में शर्म थी, पर उसके नीचे कुछ और भी था। भूख।
“इतना… बड़ा हो गया है…” उन्होंने धीरे से कहा।
फिर उनका हाथ बढ़ा।
उनकी नरम हथेली ने मेरे लंड को पकड़ लिया।
“आह्ह अम्मा…”
“चुप… माँ को देखने दे।”
अम्मा ने मेरे लंड को धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया। ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर। उनके अंगूठे ने मेरे लंड की नोक पर जमा पानी को फैला दिया।
“इतना गरम… और इतना सख्त…”
वो झुकीं। उनकी साँस मेरे लंड पर पड़ रही थी।
फिर… उनकी जीभ निकली।
एक लंबी चाट। मेरे लंड की नोक से लेकर जड़ तक।
“अम्मा… अम्मा क्या कर रही हो…”
“तेरी माँ तुझे राहत दे रही है बेटा… अब चुप रह और मज़ा ले।”
अम्मा ने पूरा लंड मुँह में ले लिया। गले तक।
उनकी गर्दन में उभार आ गया। आँखों से आँसू निकल आए, पर वो रुकीं नहीं। ऊपर-नीचे, ऊपर-नीचे। गट-गट की आवाज़ें कमरे में गूँजने लगीं।
मैं उनके बालों में उंगलियाँ फँसाए हुए था।
“अम्मा… मैं झड़ जाऊँगा…”
अम्मा ने लंड मुँह से निकाला।
“नहीं। आज झड़ने नहीं दूँगी। आज कुछ और करना है।”
वो खड़ी हुईं। नाइटी उतार दी।
नंगी अम्मा।
मेरे सामने।
47 साल की उम्र में भी उनके स्तन इतने भरे हुए थे कि जब वो झुकीं तो लटके नहीं, बल्कि भारी-भारी लटकते हुए मेरे चेहरे के सामने आ गए। निप्पल काले, बड़े, और कड़े।
और उनकी गांड…
अम्मा ने मुड़कर कमर झुकाई।
दोनों हाथ बिस्तर पर टिका दिए।
और अपनी गांड मेरे सामने कर दी।
गोल। भारी। चिकनी। दोनों टुकड़ों के बीच गहरी दरार। और उस दरार में… उनका गुलाबी, सिकुड़ा हुआ गांड का छेद।
“देख बेटा… ये तेरी अम्मा की गांड है। आज तक किसी ने नहीं छुआ। न तेरे पापा ने, न किसी और ने। आज तू छू। आज तू चोद।”
मेरा दिमाग फट गया।
मैं घुटनों के बल उनके पीछे बैठ गया। दोनों हाथों से उनकी गांड के टुकड़े फैलाए।
और चाटने लगा।
अम्मा की गांड।
मेरी जीभ उनके गांड के छेद पर घूम रही थी। गोल-गोल। अंदर धकेलने की कोशिश कर रही थी।
“आह्ह्ह… बेटा… आह्ह… जीभ अंदर डाल… अंदर…”
मैंने जीभ अंदर घुसेड़ दी। अम्मा की गांड की दीवारें मुलायम और गर्म थीं। उनकी गांड से हल्की-सी गंध आ रही थी – साबुन की, पसीने की, और स्त्री की।
मैं पागलों की तरह चाट रहा था। चूस रहा था। दाँत से हल्के काट रहा था।
अम्मा कराह रही थीं।
“हाँ… हाँ बेटा… अम्मा की गांड चाट… और चाट… और गहरा…”
जब उनकी गांड पूरी तरह गीली हो गई, तब मैंने खड़ा होकर अपना लंड उनके गांड के छेद पर लगाया।
“अम्मा… डालूँ?”
“डाल… धीरे-धीरे डाल… अम्मा की गांड फाड़ मत देना…”
मैंने धक्का दिया।
सिर्फ नोक अंदर गई।
अम्मा चीख पड़ीं।
“आह्ह्ह्ह… दर्द… दर्द हो रहा है बेटा…”
“सहन कर अम्मा… थोड़ा और…”
मैंने और धक्का दिया। आधा लंड अंदर चला गया।
अम्मा की गांड इतनी टाइट थी कि लग रहा था जैसे कोई लोहे की अंगूठी मेरे लंड को कस रही हो।
“आह्ह्ह… पूरा… पूरा डाल दे… अम्मा सह लेगी…”
एक जोरदार धक्का।
पूरा लंड अम्मा की गांड में समा गया।
अम्मा का मुँह खुला का खुला रह गया। कोई आवाज़ नहीं निकली। सिर्फ आँखों से आँसू बह रहे थे।
मैं अंदर रुका रहा। उनकी गांड की धड़कन मेरे लंड पर महसूस हो रही थी।
“अम्मा… कैसा लग रहा है?”
“भ… भरा हुआ… पूरा भरा हुआ… जैसे कोई लोहा अंदर घुस गया हो…”
मैंने धीरे-धीरे बाहर खींचा। फिर अंदर धकेला।
बाहर… अंदर… बाहर… अंदर…
अम्मा की कराहें बदलने लगीं। दर्द की कराहें अब मज़े की कराहों में बदल रही थीं।
“हाँ… हाँ बेटा… ऐसे ही… जोर से… अम्मा की गांड चोद… जोर से चोद…”
मैं पागल हो गया।
दोनों हाथ उनके कूल्हों पर रखे और पूरी ताकत से धक्के मारने लगा।
धप-धप-धप-धप…
अम्मा की गांड मेरे लंड पर बार-बार टकरा रही थी। उनके स्तन आगे-पीछे हिल रहे थे।
“अम्मा… तेरी गांड… इतनी मस्त… इतनी गरम… इतनी टाइट…”
“तेरी है… सब तेरी है बेटा… अम्मा की गांड, अम्मा की चूत, अम्मा के स्तन… सब तेरे लंड के लिए…”
मैंने उनका बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा।
“बोल अम्मा… बोल कि तू अपनी गांड अपने बेटे से चुदवा रही है…”
“हाँ… हाँ… अम्मा अपनी गांड अपने बेटे से चुदवा रही है… अम्मा अपनी गांड फड़वा रही है… और मज़ा आ रहा है… बहुत मज़ा आ रहा है…”
मैंने और तेज़ किया।
अब हर धक्के के साथ अम्मा की गांड से “छप-छप” की आवाज़ आ रही थी। उनका गांड का छेद मेरे लंड के इर्द-गिर्द सफेद झाग बना रहा था।
“अम्मा… मैं झड़ने वाला हूँ… अंदर झाड़ूँ?”
“अंदर… अंदर झाड़… अम्मा की गांड में अपना वीर्य भर दे… पूरा भर दे…”
एक आखिरी जोरदार धक्का।
और मैं फट पड़ा।
गर्म-गर्म वीर्य की धारें अम्मा की गांड के अंदर छूटने लगीं। एक… दो… तीन… चार…
अम्मा भी झड़ गईं। उनकी चूत से पानी की धाराएँ निकल रही थीं, बिस्तर गीला हो रहा था।
मैं उनके ऊपर गिर पड़ा। लंड अभी भी उनकी गांड में था।
अम्मा ने पीछे हाथ बढ़ाकर मेरे सिर को सहलाया।
“मेरा अच्छा बेटा… अम्मा की गांड अब सिर्फ तेरी है… रोज चोदना… रोज फाड़ना… जब चाहे… जहाँ चाहे…”
मैंने धीरे-धीरे लंड बाहर निकाला।
अम्मा की गांड का छेद खुला हुआ था। लाल। सूजा हुआ। और उसमें से मेरा सफेद वीर्य रिस-रिस कर उनकी जाँघों पर बह रहा था।
मैंने झुककर फिर चाटा। अपना ही वीर्य और उनकी गांड।
अम्मा काँप उठीं।
“बेटा… अब सो जा… सुबह फिर…”
लेकिन मैं सोने वाला नहीं था।
रात अभी बाकी थी।
और अम्मा की गांड अभी पूरी तरह मेरी नहीं बनी थी।
सुबह 4 बजे।
अम्मा अभी भी मेरे बिस्तर पर नंगी लेटी थीं। उनकी गांड अभी भी हल्की-हल्की फड़फड़ा रही थी।
मैं उठा। अपना लंड फिर से सख्त हो चुका था।
अम्मा की जाँघों को फैलाया। उनकी गांड के छेद पर थूक लगाया। और बिना किसी चेतावनी के पूरा लंड एक झटके में अंदर घुसेड़ दिया।
अम्मा की आँखें खुल गईं।
“आह्ह्ह… बेटा… अभी… अभी तो…”
“चुप अम्मा। आज सुबह से रात तक तेरी गांड चोदनी है। उठ।”
मैंने उन्हें घोड़े की तरह कर दिया।
और फिर से धक्के शुरू।
इस बार और क्रूर। और गहरे।
हर धक्के के साथ अम्मा की गांड से “पट… पट… पट” की आवाज़ आ रही थी।
“अम्मा… तेरी गांड अब ढीली पड़ने लगी है… और ढीली कर… और…”
“नहीं… नहीं ढीली… टाइट रख… टाइट…”
मैंने उनका मुँह पकड़ लिया।
“चुप। अब सिर्फ कराह। बात मत कर।”
मैंने पूरे 20 मिनट तक लगातार चोदा।
जब झड़ा तो फिर से अंदर ही झाड़ा।
फिर निकाला।
अम्मा को पलट दिया। उनकी टाँगें कंधों पर चढ़ा दीं। और फिर से गांड में डाल दिया।
इस पोजीशन में उनका चेहरा मेरे सामने था।
आँसू बह रहे थे। मुँह खुला था। जीभ बाहर निकली हुई थी।
“देख अम्मा… देख कैसे तेरा बेटा तेरी गांड फाड़ रहा है…”
“देख… रही… हूँ… बेटा… और… मज़ा… आ… रहा… है…”
तीसरी बार जब झड़ा, तब अम्मा की गांड से वीर्य की मोटी धार निकल रही थी।
मैंने उंगली अंदर डाली। दो उंगलियाँ। तीन।
“अम्मा… अब मुट्ठी डालूँ?”
अम्मा की आँखें फटी की फटी रह गईं।
“न… नहीं… बेटा… मत… फट जाएगी…”
“फट जाएगी तो ठीक है। अम्मा की गांड फटनी चाहिए।”
मैंने धीरे-धीरे मुट्ठी बनाई और उनके गांड के छेद पर लगाया।
अम्मा चीखने लगीं।
“आह्ह्ह्ह्ह… दर्द… बहुत दर्द… निकाल… निकाल…”
लेकिन मैंने नहीं निकाला।
धीरे-धीरे… मिलीमीटर दर मिलीमीटर… मेरी मुट्ठी अंदर जाती रही।
जब पूरी मुट्ठी अंदर चली गई, अम्मा बेहोश हो गईं।
मैंने मुट्ठी अंदर-बाहर की।
अम्मा की गांड अब एक खुला हुआ, लाल, सूजा हुआ छेद बन चुकी थी।
जब वो होश में आईं, तो मैं फिर से अपना लंड डाल चुका था।
“अम्मा… अब तेरी गांड पूरी तरह मेरी हो गई है। अब कोई और कभी इसमें नहीं डाल सकेगा। सिर्फ तेरा बेटा।”
अम्मा ने मेरे गाल पर हाथ रखा।
“हाँ बेटा… सिर्फ तू… अब अम्मा की गांड सिर्फ तेरे लंड की गुलाम है… रोज फाड़… रोज चोद… अम्मा सहेगी…”
उसके बाद के तीन दिन।
हमने घर से बाहर कदम नहीं रखा।
रात-दिन।
अम्मा की गांड।
कभी किचन में, जब वो चाय बना रही होतीं – मैं पीछे से आकर साड़ी उठाता और गांड में डाल देता।
कभी बाथरूम में – जब वो नहा रही होतीं, मैं आकर उनकी गांड को साबुन लगाता, उंगलियाँ डालता, फिर लंड।
कभी छत पर रात को – नंगी अम्मा, घोड़े की तरह, और मैं उनकी गांड में पूरा शरीर झोंक देता।
पाँचवें दिन अम्मा खुद मेरे पास आईं।
हाथ में तेल की बोतल।
“बेटा… आज अम्मा खुद तैयार है। आज अम्मा की गांड को इतना चोद कि कल चल भी न पाऊँ।”
वो चारपाई पर लेट गईं। टाँगें फैलाईं। दोनों हाथों से अपनी गांड के टुकड़े फैलाए।
“देख… कितनी खुली है अब… डाल… जितना जोर से डाल सके…”
मैंने तेल लगाया।
और फिर… जानवर बन गया।
धक्के इतने जोर के थे कि चारपाई चरमरा रही थी।
अम्मा की चीखें पूरे घर में गूँज रही थीं।
“फाड़… फाड़ दे… अम्मा की गांड फाड़ दे… अपना बना ले… पूरा अपना…”
जब मैं झड़ा, तो इतना वीर्य निकला कि अम्मा की गांड से निकल-निकल कर चारपाई पर तालाब बन गया।
मैं उनके बगल में लेट गया।
अम्मा ने मेरा सिर अपने स्तनों पर रख लिया।
“मेरा बेटा… मेरा लंड… मेरी गांड का मालिक…”
मैंने उनकी गांड पर हाथ फेरा।
अभी भी गरम। अभी भी गीली। अभी भी खुली।
“अम्मा… अब रोज ऐसे ही होगा। हर रात। हर सुबह। जब तक अम्मा की गांड पूरी तरह फट न जाए।”
अम्मा मुस्कुराईं।
“फट जाए तो नई बन जाएगी बेटा… तेरे लंड के लिए…”

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