कोटा के राजमहल में उस रात सन्नाटा इतना गहरा था कि दीवारों से भी साँसें सुनाई दे रही थीं। महाराज युद्ध के लिए दक्षिण की ओर निकल चुके थे। तीन महीने का अभियान। महल में केवल राजकुमारी मृणालिनी, उसकी दासीयाँ, और कुछ विश्वसनीय सैनिक रह गए थे। उनमें से एक था देवव्रत।
देवव्रत साधारण घर का था। उसके पिता एक साधारण घुड़सवार थे, माँ महल की रसोई में काम करती थी। लेकिन देवव्रत की निष्ठा, तलवार की मार और घोड़ों पर काबू ने उसे शाही घुड़सवार सेना में ऊँचा स्थान दिलाया था। महाराज उसे अपने बेटे की तरह मानते थे… हालाँकि सच और भी गहरा था।
सच यह था कि देवव्रत महाराज का ही रक्त था। एक दासी से पैदा हुआ अवैध पुत्र। राजकुमारी मृणालिनी की सौतेली बड़ी बहन जैसी उम्र का, लेकिन छिपा हुआ भाई। महल में किसी को पता नहीं था। केवल महाराज और बूढ़ी दाई को। और अब… मृणालिनी को भी।
उसने तीन दिन पहले जाना था।
पुराने दस्तावेज़ों में छिपा एक पत्र। माँ की मृत्यु से पहले लिखा हुआ। “तुम्हारा भाई देवव्रत है… उसे कभी मत ठुकराना।”
उस रात मृणालिनी की आँखों में आँसू थे, लेकिन मन में कुछ और। वह स्वतंत्रता चाहती थी। कला, संगीत, और अपनी इच्छाओं को। राजसी नियमों ने उसे बाँध रखा था। और देवव्रत… वह हमेशा से उसकी रक्षा करता आया था। हमेशा पास। हमेशा आँखों में कुछ अनकहा लिए।
पापा की अनुपस्थिति ने दरवाज़ा खोल दिया।
पहली रात
मृणालिनी अपने निजी कक्ष में वीणा बजा रही थी। अंगूर की बेलों वाली खिड़की से चाँदनी आ रही थी। देवव्रत पहरा दे रहा था बाहर। उसने बुलाया।
“देवव्रत… अन्दर आओ।”
वह आया। कवच उतारे बिना। तलवार कमर पर। चेहरा गंभीर।
मृणालिनी ने वीणा रखी। साड़ी का पल्लू कंधे से सरका। गला खुला। स्तनों की गोलाई साफ दिख रही थी।
“तुम जानते हो?” उसने धीरे पूछा।
देवव्रत की साँस रुकी। “क्या, राजकुमारी?”
“कि तुम मेरे भाई हो।”
कमरे में हवा ठहर गई। देवव्रत का चेहरा सफेद पड़ गया। वह घुटनों के बल बैठ गया।
“मैं… मैंने कभी—”
“मैं जानती हूँ।” मृणालिनी पास आई। उसके बालों में हाथ फेरते हुए बोली, “पापा नहीं हैं। कोई नहीं है। और मैं… मैं तुम्हें चाहती हूँ। भाई की तरह नहीं।”
देवव्रत ने आँखें उठाईं। उनमें भूख थी, डर था, और सालों से दबी हुई चाहत।
“यह पाप है।”
“तो फिर हम दोनों पापी हैं।” मृणालिनी ने उसकी दाढ़ी पकड़ी और होंठ अपने होंठों से सटा दिए।
चुंबन गहरा था। जीभें मिलीं। देवव्रत पहले हिचकिचाया, फिर टूट पड़ा। उसने राजकुमारी को कमर से पकड़ा और अपनी गोद में खींच लिया। साड़ी खुलने लगी। उसकी बड़ी हथेलियाँ उसकी पीठ पर फिसलीं, फिर स्तनों पर।
मृणालिनी ने कराहते हुए कहा, “धीरे… पहली बार है।”
देवव्रत ने उसे बिस्तर पर लिटाया। चुनरी हटाई। चोली खोली। गोरे, भारी स्तन बाहर आए। उसने एक निप्पल मुँह में लिया और चूसा। मृणालिनी की कमर उठी। उसकी उँगली नीचे गई, घाघरा उठाया, और गीली योनि को छुआ।
“इतनी गीली… मेरे लिए?”
“हाँ… सालों से।”
देवव्रत ने अपना कवच और धोती उतारी। उसका लिंग बाहर निकला – मोटा, लंबा, नसों से भरा, सिर चमकता हुआ। मृणालिनी की आँखें फटी रह गईं।
“इतना… बड़ा?”
“डरती हो?”
“नहीं। अंदर डालो। भाई… अपना लंड अपनी बहन की चूत में डालो।”
देवव्रत ने घुटनों के बल बैठकर उसके पैर फैलाए। मोटे मुख को उसकी गीली फाँकों पर रगड़ा, फिर धीरे-धीरे धकेला। मृणालिनी चिल्लाई। झिल्ली टूटी। खून की एक बूँद बिस्तर पर गिरी। लेकिन वह पीछे नहीं हटी। उसने पैर उसकी कमर पर लपेट लिए।
“और गहरा… पूरा डालो।”
देवव्रत ने एक झटके में पूरा लिंग अंदर धँस दिया। दोनों कराह उठे। फिर वह हिले। धीरे-धीरे, फिर तेज़। बिस्तर चरमराया। मृणालिनी के नाखून उसकी पीठ पर लगे। हर धक्के के साथ वह बोलती रही—
“पापा नहीं हैं… कोई नहीं सुन रहा… अपनी बहन की चूत चोदो… और तेज़…”
देवव्रत ने उसके गले पर हाथ रखा, हल्का दबाया। साँस फूलने लगी। मृणालिनी की आँखें पलटीं। वह चरम पर पहुँची। योनि ने लिंग को जकड़ लिया। देवव्रत भी नहीं रुक सका। उसने गहराई में ही बीज छोड़ दिया। गर्म, गाढ़ा वीर्य उसकी कोख में भर गया।
वे लेटे रहे। पसीने से लथपथ। जुड़े हुए।
मृणालिनी ने उसके सीने पर हाथ रखा। “कल फिर।”
अगले पंद्रह दिन
पापा की अनुपस्थिति लंबी होती गई। और उनके पाप भी।
सुबह देवव्रत घोड़ों की देखभाल करता। दोपहर में मृणालिनी संगीत सिखाती दासी को। लेकिन रात होते ही कक्ष का दरवाज़ा बंद हो जाता।
एक रात उसने उसे घोड़े की काठी पर चोदा। महल के पीछे अस्तबल में। मृणालिनी चारों हाथ-पैर काठी पर झुकी थी, साड़ी कमर तक उठी हुई। देवव्रत पीछे से घुस रहा था। हर धक्के के साथ उसकी गांड हिल रही थी।
“भाई… और अंदर… अपनी बहन की गांड भी ले लो आज।”
देवव्रत ने थूक लगाया और धीरे-धीरे पीछे के छेद में घुसा। मृणालिनी की चीख दब गई। दर्द और सुख दोनों मिले। वह रोते-रोते चरम पर पहुँची। देवव्रत ने दोनों छेदों में बारी-बारी वीर्य भरा।
दूसरी रात स्नानघर में। गर्म पानी में। मृणालिनी उसकी गोद में बैठी, लिंग योनि में लिए हुए ऊपर-नीचे हो रही थी। पानी छलक रहा था। देवव्रत उसके स्तन चूस रहा था और गले पर दाँत गड़ाए हुए था।
“मैं तुम्हारी हूँ… सिर्फ तुम्हारी… पापा लौटने से पहले जितना चाहो मुझसे लो।”
तीसरी रात उसने उसे बाँधा। रेशमी दोपट्टे से हाथ। आँखें। फिर घंटों तक चूसा, चाटा, चोदा। पहले मुँह में। फिर चूत में। फिर गांड में। अंत में दोनों के शरीर वीर्य और पसीने से चमक रहे थे।
मृणालिनी अब खुलकर बोलती—
“अपनी बहन की चूत में इतना वीर्य मत छोड़ो कि पेट फूल जाए… या छोड़ दो। मैं पाल लूँगी। तुम्हारा बच्चा।”
देवव्रत हर बार और जंगली होता गया। कभी वह उसे घुटनों पर बैठाकर मुँह में लेता, बाल पकड़कर गले तक ठूँसता। कभी उठाकर दीवार से सटाकर चोदता। कभी रात भर जागकर बार-बार लेता।
एक रात मृणालिनी ने खुद पहल की। वह उसकी धोती खोलकर घुटनों के बल बैठ गई और लिंग को दोनों हाथों से पकड़कर चाटने लगी। मोटे सिर को मुँह में लिया, गले तक उतारा, आँखों से पानी आने तक। फिर ऊपर चढ़ी और खुद ही बैठ गई।
“देखो… तुम्हारी छोटी बहन खुद तुम्हारे लंड पर नाच रही है।”
देवव्रत ने कमर पकड़कर नीचे से धक्के दिए। कमरा कराहों से भर गया।
आखिरी सप्ताह
महाराज के लौटने की खबर आ गई। दस दिन बाद।
दोनों और बेकाबू हो गए। अब कोई रोक नहीं थी।
एक दोपहर मृणालिनी ने दासी को भेज दिया और देवव्रत को अपने शयनकक्ष में बुलाया। वह पूरी नंगी लेटी थी। पैर फैले। उँगली से अपनी चूत खोलकर दिखा रही थी।
“आओ भाई। आज सिर्फ गांड। जितना चाहो कठोर।”
देवव्रत ने तेल लगाया। फिर घंटों तक उसकी गांड चोदी। पहले धीरे, फिर इतनी तेज़ कि मृणालिनी के दाँत किटकिटा गए। वह रोई, माँगी, फिर और माँगी। अंत में जब देवव्रत ने गहराई में बीज छोड़ा तो वह काँपते हुए चरम पर पहुँची। वीर्य उसकी जाँघों से बह निकला।
रात को वे छत पर गए। चाँदनी में। मृणालिनी ने उसकी गोद में बैठकर धीरे-धीरे हिचकोले लिए। दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में देखा।
“अगर पापा जान गए…”
“तो मैं मर जाऊँगा तुम्हारे लिए,” देवव्रत ने कहा। “लेकिन आज नहीं। आज तुम मेरी पत्नी हो। मेरी बहन। मेरी सब कुछ।”
उन्होंने फिर से प्रेम किया। इस बार धीरे। चुंबन के साथ। स्पर्श के साथ। अंत में जब दोनों चरम पर पहुँचे तो मृणालिनी ने उसके कान में फुसफुसाया—
“मैं गर्भवती हो सकती हूँ।”
देवव्रत मुस्कुराया। “तो अच्छा है। हमारा खून एक रहेगा।”


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