राहुल इक्कीस साल का था। माँ सुनिता बयालीस की। पति तीन दिन से बाहर था। शाम की पार्टी में दोनों ने ज़्यादा पी लिया था। व्हिस्की के बाद बीयर, बीयर के बाद फिर दो पेग। सुनिता की साड़ी पहले से ही ढीली थी, चोली पसीने से चिपक रही थी। राहुल की नज़र बार-बार माँ की छातियों और जाँघों पर जा रही थी और वह छुपा नहीं पा रहा था।
गाड़ी निकलते ही बारिश शुरू हो गई। वाइपर चल रहे थे। अंधेरी सड़क। सुनिता ने सैंडल उतार दिए, एक पैर सीट पर चढ़ा लिया। साड़ी घुटनों से ऊपर खिसक गई।
“बेटा… आज घर ले चलने का मन नहीं है,” आवाज़ भारी थी। “मुझे चूत में आग लगी है। तेरा बाप महीनों से छूता तक नहीं। और तू… तू सामने बैठा है, लंड जींस में फूल रहा है। सोच मत। आज माँ रंडी है।”
राहुल का गला सूख गया। “माँ, नशा है—”
“नशा है तो सही काम हो जाएगा।” सुनिता ने उसका हाथ पकड़कर अपनी जाँघ पर रख दिया, फिर और ऊपर सरका दिया। पैंटी नहीं थी। उंगलियाँ सीधे गीली चूत पर पड़ गईं। “देख, कितनी भीग चुकी हूँ सिर्फ़ इसलिए कि मेरा बेटा गाड़ी चला रहा है।”
राहुल ने गाड़ी एक अंधेरे मोड़ पर रोक दी। इंजन बन्द। अंदर गर्मी। बाहर बारिश। सुनिता ने साड़ी और पेटिकोट कमर तक उठा लीं, दोनों टाँगें पूरी फैला दीं। एक पैर डैशबोर्ड पर, एक राहुल के कंधे पर। चूत खुली, गुलाबी, चमकदार, फड़क रही थी।
“मुँह लगा। माँ की चूत चाट। फिर लंड डालना।”
राहुल झुका। जीभ लगी तो सुनिता की कमर उछली। उसने माँ के दोनों होठ चाटे, चूत के छेद में जीभ घुसाई, क्लिट चूसी। सुनिता के नाखून उसकी बालों में धँसे।
“हाँ बेटे… वहीं… माँ को चाट के पागल कर दे… तेरी जीभ बाप से बेहतर है…”
राहुल ने दो उंगलियाँ अंदर डाल दीं, ऊपर की तरफ़ मोड़कर रगड़ा। सुनिता झड़ गईं, जाँघें काँपने लगीं, पानी राहुल के मुँह और ठुड्डी पर लग गया। वह उठा, जींस नीचे की, लंड निकाला—मोटा, नसों वाला, सिर चमकीला, पहले से टपक रहा।
सुनिता ने आँखें फाड़कर देखा। “इतना मोटा… मुँह में दे। पहले गला भर।”
वह सीट पर झुकीं और बेटे का लंड मुँह में ले लिया। गा//ल तने, थूक टपका, आवाज़ गंदी निकली। राहुल ने सिर पकड़कर धक्के मारे। सुनिता की आँखों में पानी आ गया फिर भी उन्होंने गला खोला, लंड गले तक लिया, निकाला, फिर लिया। थूक लंड पर लार की तरह लटका।
“अब चोद माँ को,” उन्होंने लंड मुँह से निकालकर कहा। “कार की सीट पर टाँगें फैलाए पड़ी हूँ। फाड़ दे। धीरे करने वाला बेटा नहीं चाहिए।”
राहुल उनके ऊपर चढ़ा। लंड चूत के मुँह पर रगड़ा, फिर एक झटके में जड़ तक घुसा दिया। सुनिता चीखीं। गाड़ी हिल गई।
“आह्ह राम… पूरा अंदर है… माँ की चूत बेटे के लंड से फूल गई… अब हिल… जोर से हिल…”
धक्के तेज़ हुए। गीली थप-थप की आवाज़ कार में गूँजने लगी। सुनिता की छातियाँ चोली से बाहर निकलीं, राहुल ने एक निप्पल दाँत से दबाया। माँ की टाँगें उसके कमर पर लिपट गईं।
“गंदी बातें कर बेटे। माँ को सुनना है।”
“तेरी चूत कितनी तंग है माँ। शादीशुदा चूत बेटे का लंड निचोड़ रही है। कल सुबह पैंटी पहनोगी तो वीर्य टपकेगा।”
“टपकने दे। आज रात तीन बार झाड़ मेरे अंदर। मुँह में भी दे। गाँड भी भीगवा… जो मन करे कर।”
राहुल ने उन्हें पलटा, कुत्ते की पोज़िशन। सुनिता की हथेलियाँ शीशे पर थीं, छातियाँ लटक रही थीं, साड़ी कमर पर गठान बनी थी। राहुल ने पीछे से पूरा लंड घुसाया, हाथ से बाल पकड़े, दूसरे हाथ से गाँड पर थप्पड़ मारा।
“माँ रंडी बन गई बेटे के लिए। पार्टी में शरीफ औरत, कार में चूत फैलाए खड़ी है।”
सुनिता पीछे की ओर धक्के खुद मार रही थीं। “हाँ… रंडी हूँ… अपने बेटे की रंडी… और गहरा… अंडे तक ठूस…”
दूसरा झड़ना अंदर ही हुआ। गर्म धाराएँ माँ की चूत में भर गईं। राहुल निकाला तो सफ़ेद गाढ़ा माल बाहर लटका, जाँघों पर बहने लगा। सुनिता ने उंगली से उठाकर मुँह में डाल लिया, फिर राहुल को खींचकर चूमा—वीर्य के स्वाद वाला गंदा किस।
“अब घर चल। गैराज में लेना। फिर बिस्तर पर। आज सोऊँगी नहीं।”
घर के गैराज में गाड़ी रखते ही सुनिता ने दरवाज़ा बन्द कर दिया। बत्ती नहीं जलाई। उन्होंने घुटनों के बल बैठकर फिर लंड मुँह में लिया, इस बार गंदी, तेज़ चुसाई, थूक फर्श पर गिरा। राहुल ने माँ के बाल पकड़कर मुँह चोदा जब तक दूसरा माल उनके गले में न उतर गया। सुनिता ने निगला, मुँह खोला दिखाया, फिर जीभ बाहर निकालकर बाकी चाट लिया।
ऊपर कमरे में उन्होंने साड़ी फेंक दी। नंगी माँ, नंगा बेटा। सुनिता चारपाई पर पीठ के बल लेटीं, टाँगें छाती तक खींच लीं, चूत दोनों हाथों से खोली।
“इस कोण से देख। यही चूत तुझे नौ महीने पेट में रखती थी। आज वही चूत तेरा लंड निगल रही है। डाल।”
राहुल ने दोनों टाँगें कंधों पर रखीं और इतनी गहराई तक चोदा कि सुनिता की आवाज़ दब गई। पलंग की टाँगें खड़खड़ाईं। तीसरी बार वह माँ के मुँह पर आकर झड़ा—गाल, जीभ, गर्दन, छातियों पर। सुनिता ने चेहरा ऊपर किया, आँखें बन्द किए माल निगला और बेटे की उंगलियाँ अपनी चूत में डालकर खुद को रगड़ती रहीं।
सुबह चार बजे तक दो और राउंड हुए। एक बार कुर्सी पर बैठकर माँ गोद में बैठकर सवार हुईं, लंड खुद अंदर बैठाती गईं, छातियाँ राहुल के मुँह में देती गईं। आखिरी बार बाथरूम में, शीशे के सामने, राहुल पीछे से चोदता रहा और सुनिता अपनी खुली चूत और अंदर से बहता वीर्य शीशे में देखती रहीं।
सोने से पहले सुनिता ने उसका लंड हाथ में लिया, धीरे सहलाया और कान में कहा—
“कल रात फिर पीएँगे। फिर कार रोकना। माँ की टाँगें फिर फैलेंगी। तू पूछेगा नहीं। सीधे चूत में डालेगा। समझा बेटे?”
राहुल ने जवाब में उन्हें फिर चूमा, उसी गंदे स्वाद के साथ। बाहर अभी भी बारिश थी। अंदर कमरा वीर्य और पसीने की गंध से भरा था। माँ की एक टाँग अभी भी उसके पेट पर पड़ी थी, खुली, तैयार।


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