कविता मल्होत्रा पैंतालीस की थी। चेहरा अभी भी कैमरे के लायक, कमर पतली, गाँड गोल और भारी, स्तन इतने बड़े कि साड़ी की पल्लू बार-बार खिसकती। पंद्रह साल पहले उसने तीन साल के रोहन को दिल्ली के पुराने बंगले में माँ-बाप के पास छोड़ दिया था। वजह एक थी — Amateur मॉडल बनना। फिर सॉफ्ट क्लिप्स, फिर फुल पोर्न, फिर खुद की कंपनी। आज वो भारत की सबसे बड़ी प्राइवेट पोर्न प्रोडक्शन की मालकिन थी। अरबपति। चेहरा छिपाकर काम करती थी, बॉडी नहीं।
अब वो लौटी थी। बेटे को देखने। रोहन पच्चीस का, शादी नहीं, दादा-दादी के साथ। लंबा, कंधे चौड़े, जबड़ा तेज, लोअर के अंदर लंड मोटा दिखता। कविता ने गेट पर उसे देखा तो चूत में एक हल्की सी लहर दौड़ गई।
रात को दादा-दादी सो गए। कविता बेटे के कमरे में घुसी। ताला लगाया। रोहन सिर्फ लोअर में था।
उसने कुर्ता उतारा। काली लेस ब्रा। फिर ब्रा भी। गुलाबी बड़े निप्पल सख्त। पैंट खींची। चूत पर बाल नहीं, सिर्फ चिकनी गीली फांक।
कविता ने बेटे का मुँह अपने मुँह से चिपकाया। जीभ अंदर घुसा दी, लार मिला दी। चुम्बन गंदा था — काटने वाला, चूसने वाला। रोहन के होंठ भीगे। उसने माँ के निप्पल को दाँतों से दबाया।
“आह्ह… काट साले… माँ के दूध पी ले… रंडी माँ के स्तन चूस… दोनों मुँह में भर ले…”
रोहन ने दोनों स्तन मुँह में भर लिए। जीभ निप्पल पर घुमाई, दाँत से काटा। कविता का हाथ बेटे के लोअर में घुसा। लंड निकाला — मोटा, गर्म, नसें फूली, सिर चमकता। दस इंच से कम नहीं। उसने थूक लगाया और तेजी से हिलाया।
“इतना मोटा लंड… माँ की चूत में कैसे घुसेगा… फट जाएगी साले… हिला… जोर से हिला… माँ का हाथ तेरे लंड पर है…”
कविता चारपाई पर लेट गई। टाँगें फैलाईं। चूत खुली, गुलाबी, गीली, भीतरी होंठ बाहर निकले। रोहन घुटनों के बल बैठा। दो उँगलियाँ अंदर डालीं, फिर तीन। चूसते हुए चाटा। जीभ फांक के अंदर, चूत की गांठ पर।
“माँ की चूत की बदबू… पसीने और रस की… चाट रहा हूँ रंडी… तेरी चूत मीठी है माँ… और चाटूँ? गाँड की छेद भी चाटूँ?”
कविता की कमर उछली। हाथ बेटे के बालों में। “उँगली और अंदर… गाँड में भी डाल… माँ को कुतिया बना… चाट साले चाट… माँ की चूत का पानी पी जा…”
रोहन ने लंड चूत के मुँह पर रखा। एक झटका — आधा घुसा। कविता चीखी, नाखून पीठ पर गड़े।
“आह्ह्ह्ह… माँ की चूत फट रही है… इतना मोटा… पूरा डाल… जोर से मार… रुक मत…”
दूसरा धक्का — पूरा लंड अंदर तक। अंडकोष चूत से टकराए। कविता की आँखें भर आईं। रोहन ने कमर पकड़कर जोर-जोर से ठोका। हर ठोकर पर पच-पच। चूत का रस जाँघों तक बह रहा था, चारपाई गीली।
“तेरी माँ रंडी है रोहन… पोर्न कंपनी की रानी… अब बेटे की रंडी… चोद साले चोद… माँ की कोख हिला दे… भोसड़ी के… और गहरा…”
रोहन ने एक हाथ से गला हल्का दबाया, दूसरे से गाँड पर थप्पड़ मारे। छप्-छप्। लाल निशान पड़ गए। कविता और भींग गई।
“गंदी भोसड़ी वाली… बेटे को छोड़कर मॉडल बनी… अब बेटे का लंड ले… निगल भी… मुँह खोल रंडी…”
उसने लंड निकाला, माँ के मुँह में ठूंस दिया। कविता ने आँखें बंद किए बिना गला तक लिया। लार टपकी, आँखों से पानी आया, गला गर्राया, फिर भी चूसती रही। नाक से साँस, लंड गले में।
“वीर्य मुँह में डाल… निगलूँगी बेटा… माँ तेरा वीर्य पीएगी… पूरा मुँह में भर दे…”
रोहन ने नहीं डाला। लंड निकाला, फिर से चूत में एक झटके में घुसाया और अंदर ही झड़ गया। गाढ़ा वीर्य निकल-निकलकर भर गया। बाहर बहने लगा तो कविता ने उँगली से समेटा और चाट लिया, फिर बेटे के मुँह से लगाकर बाकी लार मिला दी।
“माँ की चूत में बेटे का वीर्य… अब माँ गर्भवती हो जाए तो क्या… बेटे का बच्चा पालूँगी… फिर उसको भी चोदना तू…”
कैमरा पहले से तिपाई पर चल रहा था। कविता ने कहा था — पहली रात भी रिकॉर्ड होगी। Amateur। असली।
सुबह कविता नर्स वाली छोटी सफेद ड्रेस में आई। बटन आधे खुले, स्तन बाहर आने को, सफेद टोपी टेढ़ी, स्टॉकिंग जाँघ तक और फटी हुई। रोहन को टेबल पर खड़ा किया।
“आज शूट। नर्स माँ, मरीज बेटा। गाली चलती रहेगी। थप्पड़ चलेंगे। अंदर वीर्य। कट नहीं।”
रोहन ने उसे टेबल पर पेट के बल लिटाया। ड्रेस कमर तक उठाई। पैंटी एक तरफ। चूत पीछे से दिख रही थी, कल का वीर्य अभी भी चिपका। उसने थूक लगाया और पीछे से एक झटके में घुसा दिया। कविता की टोपी गिर गई।
हर धक्के पर गाली। “माँ… रंडी… भोसड़ी… चोद… नर्स की चूत फाड़… इंजेक्शन लंड का ले… आह्ह माँ और जोर…”
थप्पड़ गाँड पर। स्टॉकिंग और फटी। कविता शीशे में देख रही थी — बेटा माँ को नर्स बनाकर चोद रहा है। कैमरा क्लोजअप ले रहा था — लंड घुसता-निकलता, चूत के होंठ लंड को चूसते।
रोहन ने बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। “बोल कैमरे में… कौन चोद रहा है…”
“बेटा… मेरा बेटा माँ की चूत मार रहा है… नर्स माँ रंडी है… अंदर डाल… भर दे साले…”
उसने अंदर ही छोड़ा। ड्रेस पर दाग। कविता मुड़ी, लंड मुँह में लिया, बाकी चाटा। कैमरे की तरफ देखकर मुस्कुराई।
दोपहर में गैराज। कार की बोनट गर्म। कविता ने साड़ी नहीं, सिर्फ नर्स ड्रेस का ऊपरी हिस्सा रखा, नीचे नंगी। बोनट पर पीठ के बल लेटी, टाँगें छत की तरफ फैलाईं। रोहन खड़ा होकर ठोक रहा था। शीशा हिल रहा था, गैराज की रोशनी पीली।
“टाँगें और फैला… माँ की चूत दिखे कैमरे में… कार पर रंडी… बेटे का लंड ले रही है…”
कविता ने अपने स्तन मसल लिए। “गैराज चुदाई… माँ की चूत कार की बोनट पर फट रही है… थप्पड़ मार… गाँड लाल कर…”
रोहन ने दोनों गाँड के लोथड़ों पर थप्पड़ मारे और गहराई तक घुसा। कविता की एड़ियाँ काँपीं। फिर से अंदर वीर्य। बोनट पर सफेद धारा।
शाम को टॉयलेट। शीशा बड़ा। कविता सिंक पर झुकी, गाँड बाहर। रोहन पीछे से। दोनों शीशा देख रहे थे।
“देख रंडी… बेटा माँ को चोद रहा है… मुँह देख… जीभ निकाल… चाट शीशा… माँ की सूरत देख जब बेटा चूत मारता है…”
लंड पूरा दिख रहा था शीशे में — घुसना, निकलना, चूत के रस से चमकना। रोहन ने एक हाथ से निप्पल मरोड़ा, दूसरे से गला। कविता की आवाज दब गई, फिर भी गाली निकली — भोसड़ी, रंडी, कुतिया, बेटे की माल।
रात को दादाजी ने दरार से देख लिया। खड़े रहे। देखा — पोता बहू को नहीं, अपनी माँ को चोद रहा है। कविता ने अगली सुबह उनको अंदर बुलाया। लिफाफा रखा।
“बेटा VP बनेगा। तुम चुप। महीने का दस लाख। घर, दवाई, सब। बोलोगे तो कंपनी और पैसे दोनों जाएँगे।”
दादाजी ने लिफाफा उठाया, सिर हिलाया, चले गए। दादी को कुछ नहीं पता चला।
तीसरे दिन ऑफिस सेट। सफेद रोशनी, काला सोफा, दो कैमरे। कविता साड़ी में — पल्लू कंधे से खिसकी, ब्लाउज के बटन खुले, स्तन आधे बाहर। रोहन को कुर्सी पर बैठाया। खुद घुटनों के बल।
लंड मुँह में लिया। क्लोजअप। गला तक। आँखें कैमरे में। लार की लड़। फिर खुद सवार हुई। साड़ी कमर पर इकट्ठी। चूत लंड पर बैठी, पूरा निगल गई। कमर घूमी। स्तन बाहर आ गए।
“Vice President बना रही हूँ तुझे… अपनी चूत की सेवा के लिए… अब हर वीडियो में माँ को चोदना… यही तेरी नौकरी है… बोल… माँ की चूत तेरी है…”
“माँ की चूत मेरी है… रंडी माँ मेरी है… चोदूँगा हर रोज…”
रोहन ने कमर पकड़कर ऊपर उछाला और अंदर ही दूसरी बार झड़ गया। कविता उतरी, लंड मुँह में लिया, बाकी वीर्य चाटा, कैमरे की तरफ देखकर बोली —
“देसी मम्मी बेटा चुदाई… माँ की चूत बेटे ने मारी… देखो सालो… यही असली हिंदी सेक्स कहानी है। Amateur model माँ, बेटा VP।”
कहानी वहीं नहीं रुकी।
चौथी रात नशा। शराब। कविता ने बेटे के मुँह में शराब डाली, खुद भी पी। कार की पिछली सीट। टाँगें एक खिड़की पर, एक सीट पर। रोहन घुटनों के बल। नशे में धक्के बेतरतीब, गाली ज्यादा। कविता हँसती-कराहती — “नशे में माँ बेटा कार में चुदाई… चूत फैला… और मार… गाड़ी हिल रही है साले…”
पाँचवीं रात फैंटेसी। कविता ने छोटी चोटी बाँधी, छोटी टॉप, स्कर्ट। “आज मैं तेरी छोटी बहन। पापा नहीं हैं। बहन की चूत मार।” रोहन ने स्कर्ट उठाई, पैंटी खींची और खड़े-खड़े मारा। गाली बदली — बहन, छोटी रंडी, पापा की अनुपस्थिति। कैमरा चला। बाद में कविता ने कहा — “टाइटल लगेगा भाई बहन, लोग ढूँढेंगे। अंदर वही माँ-बेटा रहेगा।”
हर रात कुछ नया। टॉयलेट शीशा दोबारा। गैराज दोबारा। साड़ी उठाकर सोफे पर। सुबह रसोई में, जब दादी बाजार गईं — सिंक पर झुकाकर। हर बार अंदर वीर्य। हर बार निगलना। हर बार थप्पड़ और गला और भोसड़ी और रंडी माँ।
रोहन का लंड अब माँ की चूत पहचानता था। कविता की चूत अब बेटे के आकार की हो गई थी — तंग रहती, लेकिन पूरा ले लेती। सुबह उठती तो जाँघों के बीच सूखा वीर्य। वो उँगली से निकालकर चाटती, बेटे को जगाती, फिर से मुँह में लेती।
एक हफ्ते बाद कंपनी की मीटिंग। स्क्रीन पर क्लिप्स। कविता ने बोर्ड के सामने घोषणा की — रोहन मल्होत्रा, Vice President, क्रिएटिव एंड टैलेंट। किसी ने मुँह नहीं खोला। पैसे सबको पता थे।
रात को कविता बेटे के लंड को हाथ में लेकर सोने से पहले फुसफुसाई।
“तूने माँ को चोदा… अब माँ सिर्फ तेरी रंडी है। कंपनी तेरी, चूत तेरी, मुँह तेरा। अगला शूट कल। नर्स दोबारा। आज रात एक बार और अंदर डाल। माँ गर्भवती हो या न हो, वीर्य तो माँ की चूत का हक है।”
रोहन ने टाँग उठाई, लंड लगाया, एक ही धक्के में पूरा घुसाया। कविता की साँस फूटी। पलंग फिर चरमराया। गाली फिर निकली। कैमरा कोने में फिर हरा दिख रहा था।
माँ लौटी थी बेटे को देखने। बेटे ने माँ की चूत फाड़ दी। और अब दोनों उसी को अपना धंधा और अपना बिस्तर बना चुके थे।
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