नेहा का लेहंगा उठा कर बाप राजेश ने सौतेली बेटी की चूत में पूरा लंड घुसा कर अंदर वीर्य छोड़ दिया

नेहा का लेहंगा उठा कर बाप राजेश ने सौतेली बेटी की चूत में पूरा लंड घुसा कर अंदर वीर्य छोड़ दिया

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नेहा बाईस साल की थी। सुषमा तीन दिन के लिए माँ के गाँव गई हुई थी, और घर की चाबी राजेश के पास थी। पहली रात नेहा हरा रेशमी लेहंगा और पीली चोली पहनकर रसोई में पानी भर रही थी। लेहंगे की डोरी कमर पर ढीली बँधी थी। हर झुकने पर कपड़ा ऊपर सरकता और जाँघ की गोलाई दिख जाती।

राजेश दरवाज़े पर खड़ा था। पजामा में उसका लंड पहले से सख्त था। उसने नेहा की कमर पकड़ी और लेहंगे की डोरी एक झटके में खोल दी।

“पापा…” नेहा का गिलास काउंटर पर रह गया।

“चुप। तेरी माँ नहीं है। आज से जब तक वह नहीं आती, यह लेहंगा कमर से ऊपर रहेगा और मैं चोदूँगा।”

उसने दोनों हाथों से लेहंगा समेटा और नाभि के ऊपर चढ़ा दिया। मुट्ठी में कपड़ा भींच लिया ताकि गिरे नहीं। नेहा के नितंब, जाँघें और योनि पूरी खुली हो गईं। अंदर कोई panty नहीं थी। भगोष्ठ पहले से गीले थे। बीच की दरार चमक रही थी। क्लिटोरिस छोटा सा सूजा हुआ बाहर निकला था। राजेश ने थूक हथेली पर लिया और पूरी योनि पर मल दिया। दो उँगलियाँ भगोष्ठ फैलाकर अंदर घुसा दीं। गर्म, संकरी, दीवारें उँगलियों को चूस रही थीं।

नेहा की साँस टूट गई। “आह… पापा… उँगली गहरी कर रहे हो… रस निकल रहा है…”

राजेश उँगलियाँ तेज अंदर-बाहर करने लगा। गीली आवाज़ रसोई में गूँज रही थी। अंगूठा क्लिटोरिस पर गोल-गोल रगड़ रहा था। नेहा के घुटने मुड़ने लगे। उसने काउंटर पकड़ लिया। तीसरी उँगली भी ठूँस दी गई। नेहा चीखी और पहली बार झड़ गई। योनि ने उँगलियों को भींच लिया, गर्म रस हथेली तक बह गया।

राजेश ने उँगलियाँ निकालकर चाटीं, फिर नेहा को मुँह के बल काउंटर पर झुका दिया। लेहंगा अभी भी उसकी मुट्ठी में कमर के ऊपर था। नितंब ऊपर। उसने चूतड़ फैलाए। योनि का मुँह खुला काँप रहा था, अंदर से सफेद-सा रस टपक रहा था। गुदा भी सिकुड़ रहा था।

उसने पजामा गिराया। लंड मोटा था, नसें उभरी हुई, सुपारा लाल और चमड़ी से पूरा बाहर। पूर्ववीर्य का धागा नीचे लटक रहा था। सिरा नेहा की योनि पर रगड़ा, ऊपर-नीचे, क्लिटोरिस से लेकर छेद तक। फिर एक झटके में आधा अंदर।

नेहा चिल्लाई। “पापा… बड़ा है… आह… धीरे… फट रही है…”

राजेश ने कमर के दोनों तरफ पकड़ा, लेहंगा एक हाथ में समेटे रखा, और बाकी लंड जड़ तक ठेल दिया। अंडकोश भगोष्ठों से टकराए। वह अंदर ही रुककर हिला, सुपारा गर्भाशय के मुँह पर घिसने लगा। नेहा के मुँह से केवल टूटी सिसकियाँ निकल रही थीं।

धक्के शुरू हुए। पूरा बाहर, फिर पूरा अंदर। हर बार छपाक की आवाज़। लेहंगे की किनारी उसकी पीठ पर पड़ रही थी। राजेश झुककर उसके कान में बोला, “सौतेली बेटी की चूत माँ से टाइट है। और रस भी ज्यादा बहाती है। देख, लंड कैसे निगल रही है।”

नेहा अब खुद पीछे धक्का मार रही थी। “और जोर… पापा… लेहंगा मत छोड़ना… उठाए रखो… गहरा चोदो…”

राजेश ने बाल पकड़कर सिर उठा लिया। दूसरे हाथ से एक स्तन मरोड़ा। निप्पल कड़ा था। वह तेज चोदने लगा। काउंटर हिल रहा था। नेहा दूसरी बार झड़ी। योनि की दीवारें लहर बनकर लंड पर सिकुड़ीं, और इतना रस निकला कि अंडकोश तक भीग गए। राजेश रुका नहीं। और बीस गहरे धक्के मारे, फिर जड़ तक घुसाकर रुक गया। लंड अंदर धड़का। गर्म वीर्य की पहली धार सीधे गर्भाशय की तरफ छूटी, फिर दूसरी, तीसरी। वह हिलता रहा ताकि हर बूँद अंदर रहे। वीर्य भरकर किनारों से सफेद झाग बनकर टपका, लेहंगे की भीतरी सिलाई पर लग गया।

लंड बाहर खींचा। छेद खुला रहा। वीर्य धागे की तरह बाहर निकला। राजेश ने दो उँगलियाँ अंदर डालकर वीर्य वापस ठेल दिया।

“मुँह खोल,” उसने कहा।

नेहा पलटी। लेहंगा अभी भी कमर पर समेटा था। वह घुटनों पर बैठी। राजेश ने वीर्य से सना लंड उसके होठों पर रगड़ा। नेहा ने मुँह खोला। सुपारा अंदर गया। उसने जीभ से नीचे की नस चाटी, फिर जितना मुँह में समाया उतना लिया। राजेश ने सिर पकड़कर धीरे मुँह चोदा। लार और वीर्य ठुड्डी पर बहने लगे। जब वह हाँफने लगी तो उसने लंड निकाल लिया।

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उस रात दूसरी बार बिस्तर पर हुई। नेहा पीठ के बल लेटी। राजेश ने लेहंगा फिर कमर तक चढ़ाया और दोनों टाँगें कंधों पर रख दीं। इस बार वह धीमे-धीमे पूरा अंदर करता, रुकता, फिर तेज मारता। नेहा के स्तन हर धक्के पर उछलते। वह चूचियाँ चूसता रहा, निप्पल दाँतों में लेकर खींचता रहा। नेहा तीन बार झड़ी। आखिरी बार राजेश ने लंड निकालकर उसके पेट, चूचियों और लेहंगे पर वीर्य छोड़ दिया। सफेद धारें नाभि में जमा हो गईं। उसने उँगली से वीर्य समेटा और नेहा के मुँह में डाल दिया। नेहा ने चूस लिया।

दूसरी रात नेहा ने वही लेहंगा पहना, पर चोली नहीं। राजेश ने उसे बैठक के सोफे पर घुड़सवार बनाया। लेहंगा ऊपर समेटा। नेहा खुद लंड पर बैठ गई। पहले सिरा, फिर आधा, फिर अपनी रफ्तार से जड़ तक। वह ऊपर-नीचे उछलने लगी। चूचियाँ राजेश के मुँह के सामने झूल रही थीं। वह एक-एक करके चूसता रहा। नेहा की योनि हर बार नीचे बैठने पर छपाक बोलती। रस उसकी जाँघों और राजेश के अंडकोश पर बह रहा था।

“पापा… अंदर ही झड़ूँगी…” उसने कहा और कमर घुमाते हुए चरम पर पहुँच गई। राजेश ने उसकी कमर पकड़कर नीचे बैठाए रखा और नीचे से धक्के मारे। जब वह झड़ चुकी तो उसने नेहा को उलटा किया, घुटनों पर, और पीछे से फिर चोदा। इस बार गुदा के छेद पर अंगूठा रखकर योनि में ही मारता रहा। आखिर में फिर अंदर स्खलित हुआ। वीर्य इतना था कि नेहा के उठते ही जाँघों पर दो धारें बह निकलीं।

तीसरी रात फर्श पर हुई। नेहा लेहंगा उठाए चारों हाथ-पैर पर थी। राजेश पीछे घुटनों के बल। एक हाथ से लेहंगा समेटे, दूसरे से बाल पकड़े। धक्के इतने जोर के थे कि नेहा के स्तन हवा में झूल रहे थे। वह गालियाँ दे रही थी और मना भी कर रही थी, पर कमर पीछे धकेलती रही। “चोदो पापा… सौतेली की चूत फाड़ दो… लेहंगा ऊपर… और गहरा…” राजेश ने उसकी योनि से लंड निकालकर दो बार गुदा के मुँह पर रगड़ा, पर अंदर नहीं किया। फिर योनि में वापस घुसाकर झड़ गया। वीर्य फर्श पर भी टपका।

सुषमा के लौटने से पहले आखिरी सुबह नेहा नहाकर निकली तो राजेश ने तौलिया खींच लिया और गीले बदन पर वही लेहंगा लपेटकर कमर के ऊपर चढ़ा दिया। बाथरूम के दरवाज़े से सटाकर खड़े-खड़े चोदा। पानी अभी टपक रहा था। हर धक्के पर गीली त्वचा चिपक रही थी। नेहा ने आईना देखा। लेहंगा ऊपर, बाप का लंड उसकी योनि में अंदर-बाहर हो रहा था, वीर्य और रस मिलकर जाँघों पर बह रहे थे। वह आईने में देखते हुए झड़ गई। राजेश ने आखिरी बार गहरा घुसाया और पेट के अंदर खाली हो गया।

नेहा हाँफती रही। लेहंगा अभी भी ऊपर था। “माँ आ जाए तो लेहंगा अलमारी में रखूँगी,” उसने कहा। “रात को जब वह सो जाए, मेरे कमरे में आ जाना। वही लेहंगा उठा कर चोदना। अंदर ही छोड़ना। मैं आवाज़ नहीं करूँगी।”

राजेश ने लंड बाहर निकाला। खुली योनि से वीर्य टपका। उसने लेहंगा गिराया नहीं। कपड़ा समेटे रखा, और नेहा को चूम लिया। घर में केवल उनकी साँसें और गीले कपड़े की आवाज़ बची थी।



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