ठाकुर हरि सिंह अपने पुराने हवेली के आंगन में बैठे व्हिस्की का घूंट ले रहे थे। उनकी उम्र ५२ साल थी, लेकिन शरीर अभी भी जवान था – ६ फीट २ इंच लंबा, चौड़ा सीना, मोटी मांसपेशियां और वो मूंछें जो गाव के हर आदमी को डराती थीं। ठाकुर साहब पूरे इलाके के मालिक थे। जमीन, किसान, नौकर-चाकर – सब उनके इशारे पर नाचते थे।
उनके बेटे विकास की शादी को अभी तीन महीने ही हुए थे। बहू का नाम था प्रिया – २४ साल की, गोरी, नाजुक काया, बड़ी-बड़ी आंखें और वो मोटा गोल गांड जो साड़ी में फटने को तैयार रहता था। प्रिया शहर की लड़की थी, लेकिन शादी के बाद गाव की हवेली में आकर उसकी जिंदगी बदल गई थी।
शाम ढल चुकी थी। विकास दिल्ली में नौकरी के सिलसिले में गया हुआ था – पूरे हफ्ते के लिए। ठाकुर साहब ने जानबूझकर उसे भेजा था।
“प्रिया! इधर आ!” ठाकुर की गहरी आवाज हवेली में गूंजी।
प्रिया रसोई से साड़ी संभालती हुई आई। उसकी साड़ी का पल्लू थोड़ा सरक गया था, जिससे उसकी कसी हुई चोली में मोटे स्तन उभर रहे थे।
“जी… बाबूजी?” उसकी आवाज कांपी।
ठाकुर ने उसे ऊपर से नीचे तक घूरा। उनकी आंखों में भूख थी।
“बैठ यहां।” उन्होंने अपनी गोद की तरफ इशारा किया।
“बाबूजी… ये क्या? मैं आपकी बहू हूं…” प्रिया पीछे हटी।
ठाकुर हंसे। “बहू? तू तो मेरी रंडी बनने आई है। विकास तो नाम का मर्द है। आज मैं तुझे सिखाऊंगा असली मर्द क्या होता है।”
प्रिया भागने लगी, लेकिन ठाकुर ने उसका हाथ पकड़ लिया। उनकी मजबूत पकड़ में वो जैसे कागज की तरह थी। उन्होंने उसे खींचकर अपनी गोद में बिठा लिया। प्रिया के हाथ-पैर मार रही थी, लेकिन ठाकुर ने उसकी दोनों कलाइयां एक हाथ से पकड़ लीं।
“छोड़िए बाबूजी! प्लीज… मैं चीख दूंगी!” प्रिया रोने लगी।
ठाकुर ने उसका मुंह अपनी बड़ी हथेली से दबा दिया। “चीख ले। कोई नहीं आएगा। सारे नौकर जानते हैं कि ठाकुर साहब क्या चाहते हैं।”
उन्होंने प्रिया की साड़ी का पल्लू खींचा। साड़ी खुल गई। सफेद ब्लाउज में उसके ३६ इंच के मोटे स्तन उछल रहे थे। ठाकुर ने ब्लाउज के हुक फाड़ दिए। ब्रा के अंदर से गुलाबी निप्पल झांक रहे थे।
“वाह रंडी… कितने बड़े चुचे हैं तेरे। विकास इनको चूसता भी होगा?”
प्रिया सिर हिला रही थी, आंसू बह रहे थे। ठाकुर ने ब्रा खींचकर नीचे किया और एक स्तन मुंह में ले लिया। जोर-जोर से चूसने लगे। प्रिया के बदन में करंट सा दौड़ गया। वो अनचाहे ही कराह उठी – “आह्ह्ह… नहीं… बाबूजी…”
ठाकुर हंसे। “देख, तेरी चूत पहले ही गीली हो रही है।” उन्होंने प्रिया की साड़ी पूरी तरह उठाकर उसकी पैंटी पर हाथ रख दिया। पैंटी भीग चुकी थी।
“नहीं… प्लीज… मेरा पति…” प्रिया फुसफुसाई।
“पति? वो तो तेरा नाम का पति है। आज से तू मेरी रखैल है।”
ठाकुर ने प्रिया को उठाकर बेडरूम में ले जाया। उसकी कमर पर हाथ रखकर उसे बिस्तर पर पटक दिया। प्रिया उठने की कोशिश कर रही थी, लेकिन ठाकुर ने अपनी लुंगी खोल दी। उनका ९ इंच का मोटा, काला लंड बाहर आ गया – पूरी तरह खड़ा, नसें फूली हुईं।
प्रिया की आंखें फट गईं। “ये… ये तो इतना बड़ा है… नहीं… मुझे मार डालेगा…”
ठाकुर ने प्रिया की टांगें फैलाकर उसके बीच में घुटनों के बल बैठ गए। उन्होंने उसकी पैंटी फाड़ दी। प्रिया की छोटी-सी शेव्ड चूत चमक रही थी, रस से तर।
“देख कितनी भूखी है तेरी चूत।” उन्होंने दो उंगलियां अंदर डाल दीं। प्रिया जोर से चीखी – “आआआह्ह्ह… निकालिए… दर्द हो रहा है!”
लेकिन ठाकुर उंगलियां तेजी से अंदर-बाहर करने लगे। प्रिया का बदन कांपने लगा। उसकी इच्छा के खिलाफ भी उसकी चूत सिकुड़ रही थी।
“रंडी… अब असली चीज चख।” ठाकुर ने अपना लंड प्रिया की चूत के मुंहाने पर रखा और एक जोरदार धक्का दिया।
“नाहीइइइइइ!” प्रिया चीख उठी। ठाकुर का मोटा लंड आधा ही अंदर गया था, लेकिन प्रिया को लगा जैसे उसकी चूत फट गई हो।
ठाकुर रुके नहीं। दूसरे धक्के में पूरा लंड अंदर चला गया। प्रिया के पेट में उभार दिखाई देने लगा। ठाकुर ने धीरे-धीरे तेजी पकड़ी। हर थप्पड़ के साथ प्रिया की चीखें कम होती जा रही थीं और कराहों में बदल रही थीं।
“आह्ह्ह… बाबूजी… धीरे… आह्ह्ह… ओह मां… कितना मोटा है…”
ठाकुर ने प्रिया के दोनों स्तनों को मसलते हुए जोर-जोर से चोदना शुरू किया। “ले रंडी… ले मेरी बहू… अब तू मेरी जवान चूत है।”
प्रिया का बदन हिल रहा था। अनचाहे ही उसके कूल्हे ऊपर उठने लगे। ठाकुर ने उसे पलटकर कुत्ते की मुद्रा में किया और पीछे से घुसा। प्रिया का गोल गांड हर धक्के पर लहरा रहा था।
“मेरी रानी… तेरी गांड भी चोदूंगा आज।” ठाकुर ने थूक लगाकर अपनी उंगली प्रिया की गांड में डाली।
“नहीं बाबूजी… वहां नहीं… आह्ह्ह!” लेकिन ठाकुर ने धीरे-धीरे अपना लंड निकाला और गांड के छेद पर रख दिया।
एक जोरदार धक्का। प्रिया की आंखें उलट गईं। दर्द और अनजानी खुशी का मिश्रण था। ठाकुर ने पूरी रात प्रिया को अलग-अलग तरीकों से चोदा – मुंह में, चूत में, गांड में। प्रिया बार-बार जबरदस्ती के बावजूद झड़ गई।
सुबह होते-होते प्रिया ठाकुर के सीने पर लेटी हुई थी, उनका लंड अभी भी उसके अंदर था।
“अब तू रोज रात को मेरे पास आएगी। समझी?” ठाकुर ने उसके बालों में हाथ फेरा।
प्रिया ने शर्म से सिर हिलाया। “जी… बाबूजी…”
ठाकुर हरि सिंह की हवेली पूरे गांव पर राज करती थी। ५२ साल के ठाकुर साहब का शरीर अभी भी जवान था – लंबा कद, चौड़ी छाती, मोटी बाहें और वो घनी मूंछें जो हर किसान को कांपने पर मजबूर कर देती थीं। उनकी पत्नी गुजर चुकी थी और बेटा विकास शहर में नौकरी करता था।
शादी को सिर्फ तीन महीने हुए थे। बहू प्रिया – २४ साल की, गोरी-चिट्टी, नाजुक चेहरा, ३६-२८-३८ का आकर्षक बदन। शहर की पढ़ी-लिखी लड़की, लेकिन शादी के बाद इस गांव की हवेली में फंस गई थी।
उस रात विकास दिल्ली गया हुआ था। ठाकुर साहब ने जानबूझकर उसे भेज दिया था।
“प्रिया! इधर आ!” ठाकुर की भारी आवाज हवेली के आंगन में गूंजी।
प्रिया साड़ी संभालती हुई आई। उसकी लाल साड़ी में उसका गोल गांड और कसी हुई चोली देखकर ठाकुर की आंखें चमक उठीं।
“जी बाबूजी?” प्रिया ने शर्माते हुए कहा।
ठाकुर ने खाली जगह पर इशारा किया, “बैठ।”
प्रिया हिचकिचाई, लेकिन बैठ गई। ठाकुर ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।
“बाबूजी… ये क्या कर रहे हैं?” प्रिया घबराकर बोली।
“चुप रह रंडी। आज तुझे पता चलेगा कि असली मर्द कौन है।” ठाकुर ने उसे अपनी गोद में खींच लिया।
प्रिया ने छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन ठाकुर की पकड़ लोहे जैसी थी। उन्होंने प्रिया के मुंह पर हाथ रख दिया और दूसरे हाथ से उसकी साड़ी का पल्लू खींचा। ब्लाउज के हुक फट गए। सफेद ब्रा में उसके मोटे, गोल स्तन बाहर आ गए।
“वाह… कितने बड़े और टाइट चुचे हैं तेरे।” ठाकुर ने एक स्तन जोर से मसल दिया।
प्रिया रोने लगी, “नहीं बाबूजी… प्लीज छोड़ दीजिए… मैं आपकी बहू हूं।”
“बहू बनकर आई है तो बहू की तरह ही चुदेगी।” ठाकुर ने ब्रा खींचकर नीचे कर दी और एक निप्पल मुंह में ले लिया। जोर-जोर से चूसने और काटने लगे।
प्रिया के बदन में अनचाहा कंपकंपी छूट गई। “आह्ह्ह… दर्द हो रहा है… छोड़िए…”
ठाकुर ने हंसकर उसकी साड़ी पूरी तरह उठा दी। पैंटी पहले से गीली थी। उन्होंने दो उंगलियां पैंटी के अंदर डाल दीं।
“देख… तेरी चूत तो पहले ही पानी छोड़ रही है। विकास कभी इतना गीला कर पाया है तुझे?”
प्रिया शर्म और डर से सिर हिला रही थी। ठाकुर ने उसकी पैंटी फाड़ दी और घुटनों के बल बैठकर अपना ९ इंच लंबा, मोटा काला लंड बाहर निकाला।
प्रिया की आंखें फट गईं। “ये… ये तो घोड़े जैसा है… नहीं… मुझे मार डालेगा…”
ठाकुर ने प्रिया की टांगें चौड़ी कीं और लंड का सिरा उसकी चूत पर रगड़ा। फिर एक जोरदार धक्का।
“आआआह्ह्ह्ह्ह! नाहीइइइइ!” प्रिया चीख उठी। आधा लंड ही अंदर गया था, लेकिन उसकी चूत फटने जैसा दर्द हो रहा था।
ठाकुर रुके नहीं। दूसरे, तीसरे धक्के में पूरा लंड प्रिया की चूत में समा गया। पेट में उभार दिखाई दे रहा था। ठाकुर ने तेजी से चोदना शुरू किया।
“ले रंडी… ले मेरी बहू की चूत… कितनी टाइट है तेरी… आह्ह्ह… विकास की चीज आज से मेरी है।”
प्रिया रो रही थी, लेकिन कुछ देर बाद उसके मुंह से कराह निकलने लगी – “आह्ह्ह… बाबूजी… धीरे… आह्ह्ह… गहरी जा रही है…”
ठाकुर ने उसे पलटा और कुत्ते की मुद्रा में चोदा। प्रिया का गोल गांड हर थप्पड़ पर लहरा रहा था। ठाकुर ने उसके बाल खींचे और जोर से चपत लगाई।
“चुद रंडी… चुद अपनी सासुरे से।”
उन्होंने प्रिया को घंटों चोदा – कभी चूत में, कभी मुंह में। आखिरकार ठाकुर ने प्रिया की चूत में जोर-जोर से झड़ दिया। गर्म वीर्य प्रिया की चूत से बाहर निकल रहा था।
प्रिया थककर बिस्तर पर पड़ी थी। ठाकुर ने उसके कान में फुसफुसाया, “अब रोज रात को मेरे बेडरूम में आना पड़ेगा। वरना पूरे गांव को बता दूंगा कि मेरी बहू कितनी बड़ी रंडी है।”
दूसरी रात
अगली रात ठाकुर ने प्रिया को हवेली की छत पर बुलाया। चांदनी रात थी। ठाकुर ने प्रिया को नंगी कर दिया और छत की दीवार से सटाकर खड़ा किया।
“आज तेरी गांड चोदूंगा।”
प्रिया घबरा गई, “नहीं बाबूजी… वहां नहीं… बहुत दर्द होगा…”
ठाकुर ने थूक लगाकर अपनी उंगली गांड में डाली, फिर दो। प्रिया कराह रही थी। फिर ठाकुर ने अपना मोटा लंड गांड के छेद पर रखा और धीरे-धीरे दबाया।
“आआआह्ह्ह्ह! फट जाएगी… बाबूजी प्लीज…” प्रिया चीख रही थी।
ठाकुर ने पूरा लंड गांड में उतार दिया और तेजी से चोदने लगे। प्रिया का बदन दर्द और अजीब सी खुशी से कांप रहा था। कुछ देर बाद वो खुद पीछे हिलने लगी।
“हां रंडी… अब तुझे गांड चुदवाना पसंद आने लगा है।”
ठाकुर ने छत पर ही प्रिया को तीन बार चोदा – चूत, मुंह और गांड में।
तीसरी रात – और गंदा
ठाकुर ने प्रिया को अपने पुराने दोस्त ठाकुर रणवीर के साथ शेयर करने का फैसला किया। दोनों ठाकुर प्रिया को बीच में लेकर चोद रहे थे।
रणवीर ने प्रिया के मुंह में लंड ठूंसा, जबकि हरि सिंह उसकी चूत और गांड बारी-बारी से चोद रहे थे।
“ले बहू… दो ठाकुरों की रंडी बन जा।”
प्रिया रो-रोकर चुद रही थी, लेकिन उसका बदन बार-बार झड़ रहा था। दोनों ठाकुरों ने प्रिया के पूरे बदन पर वीर्य छिड़क दिया।
विकास के आने के बाद
विकास वापस आ गया। लेकिन ठाकुर की हवस नहीं रुकी। वो रात में प्रिया को विकास के बगल वाले कमरे में बुलाते और चोदते। कभी-कभी विकास सोते हुए भी प्रिया की चीखें सुन लेता, लेकिन डर के मारे चुप रह जाता।
एक रात ठाकुर ने विकास को भी मजबूर किया कि वो देखे कैसे उसकी पत्नी चुद रही है।
“देख बेटा… तेरी बीवी कितनी खुश है मेरे लंड से।”
प्रिया शर्म से मर रही थी, लेकिन ठाकुर के डर से चुप थी।
कुछ महीने बाद
प्रिया गर्भवती हो गई। ठाकुर खुश थे। “अब ये बच्चा मेरा होगा। तू मेरी स्थायी रखैल है।”
प्रिया अब पूरी तरह ठाकुर की हवस का शिकार बन चुकी थी। दिन में वो साधारण बहू बनती, रात में ठाकुर की नंगी रंडी।
ठाकुर उसे हर तरीके से चोदते – कभी तेल लगाकर मालिश करते हुए, कभी कमरे में बांधकर, कभी हवेली के नौकरों के सामने। प्रिया की सारी शर्म खत्म हो चुकी थी। वो खुद कहने लगी थी – “बाबूजी… आज मेरी गांड चोदिए… मेरी चूत में अपना मोटा लंड डालिए…”
अंत
ठाकुर की हवस ने प्रिया को पूरी तरह बदल दिया। गांव की मासूम बहू अब ठाकुर की निजी रंडी बन चुकी थी। और ठाकुर हर रात उसकी चूत, गांड और मुंह में अपनी हवस ठंडी करते।
समाप्त

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