बहू की टाँगें फैली नौकरानी चाट ठाकुर अंदर

बहू की टाँगें फैली नौकरानी चाट ठाकुर अंदर

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गाँव के किनारे ऊँचे बाड़े वाले ठाकुर हरि सिंह के हवेली में होली का शोर पहले से गूँज रहा था। ढोल, गुलाल, मिठाइयों की खुशबू और औरतों की हँसी। ठाकुर साहब पचास के करीब थे, चौड़ी छाती, मोटी मूँछें, और वह नज़र जो गाँव में किसी को भी नीचे गिरा देती थी। उनके छोटे भाई की पत्नी प्रिया बहू उस हवेली की सबसे सुंदर स्त्री मानी जाती थी। गेहुँआ रंग, भारी स्तन, पतली कमर और वह चाल जिससे साड़ी का पल्लू बार-बार सरक जाता।

प्रिया उस सुबह लाल चुनरी बाँधे आँगन में खड़ी थी। त्योहार का उत्साह उसके शरीर में भी दौड़ रहा था। ठाकुर साहब की नज़र उससे बार-बार टकराती, लेकिन वह मुँह फेर लेती। घर में एक नई नौकरानी आई थी—कमला। पच्चीस-छब्बीस साल की, काली-कलूटी, गोल कूल्हे, और ऐसी आँखें जो सीधे देखतीं। कमला रसोई से पानी लाते हुए प्रिया के पास रुकी।

“बहू जी, आज आप बहुत सुंदर लग रही हैं।” कमला की आवाज़ धीमी थी, लेकिन उसमें एक गर्मी थी।

प्रिया मुस्कुराई। “तुम भी कम नहीं। साड़ी अच्छी बाँधी है।”

दोनों की निगाहें कुछ देर तक मिली रहीं। त्योहार की भीड़ में यह छोटी सी बात किसी ने नहीं देखी। दोपहर को जब औरतें रंग खेलने निकलीं, प्रिया और कमला पीछे रह गईं। पुराने आम के बाग के पास एक टूटी कोठरी थी, जहाँ कभी अनाज रखा जाता था। कमला ने प्रिया का हाथ पकड़ लिया।

“इधर चलिए।”

कोठरी के अंदर धूप की पतली रेखा फर्श पर पड़ी थी। कमला ने दरवाज़ा बंद किया। एक पल की खामोशी। फिर प्रिया ने कमला का चेहरा दोनों हाथों में लिया और होंठ से होंठ मिला दिए। चुंबन पहले धीमा था, फिर गहरा होता गया। कमला की जीभ प्रिया के मुँह में घुसी। प्रिया की साँस तेज़ हो गई। कमला के हाथ साड़ी के नीचे चले गए, पेट पर, फिर ऊपर—स्तनों को पकड़ लिया।

प्रिया की आवाज़ काँपी, “धीरे… कोई आ जाएगा।”

कमला मुस्कुराई और घुटनों के बल बैठ गई। उसने साड़ी का पल्लू हटाया, पेटीकोट ऊपर किया। प्रिया की चूत पहले से गीली थी। कमला ने जीभ निकाली और धीरे-धीरे चाटा—ऊपर से नीचे, फिर बीच की दरार में घुसा दिया। प्रिया की कमर काँपी। वह दीवार से सट गई, एक हाथ कमला के बालों में फँसाए। कमला की जीभ तेज़ हुई, दो उंगलियाँ अंदर घुस आईं। प्रिया की आवाज़ दबी रही, लेकिन शरीर हिलता रहा। पहला ओर्गाज्म आते ही उसके पैर काँप गए। कमला ने मुँह नहीं हटाया, रस चाटती रही।

प्रिया ने कमला को उठाया, उसे फर्श पर लिटाया और खुद उसके ऊपर बैठ गई। दोनों की चूतें रगड़ने लगीं। कपड़े बिखर गए। स्तन से स्तन चिपक गए। पसीना, गुलाल की हल्की गंध, और दो महिलाओं की साँसें एक हो गईं। प्रिया ने कमला की गांड पकड़ी, उसे और पास खींचा। कमला चिल्लाई, लेकिन आवाज़ रूमाल से दबा ली। दूसरी बार दोनों एक साथ काँपीं।

इसी समय कोठरी के छोटे से झरोखे के पीछे ठाकुर हरि सिंह खड़े थे। उन्होंने सब देखा। मूँछों के नीचे मुस्कान थी, लेकिन आँखों में भूख। वह अंदर घुसे। दरवाज़ा पीछे से बंद हो गया।

प्रिया और कमला सहम गईं। कपड़े समेटने लगीं। ठाकुर साहब ने हाथ उठाया।

“रुको।” आवाज़ भारी थी। “भागने की ज़रूरत नहीं।”

प्रिया काँप रही थी। “ठाकुर साहब…”

वह पास आए। उनकी कमीज़ के बटन खुले हुए थे। उन्होंने प्रिया का ठुड्डी उठाया। “मैंने देखा। तुम दोनों अच्छी लग रही थीं।” फिर कमला की ओर देखा। “तुम भी।”

कमला नीचे देखने लगी, लेकिन शरीर नहीं हिला। ठाकुर ने अपनी धोती खोली। उनका लंड पहले से तना हुआ था, मोटा, नसों वाला। प्रिया की निगाह उस पर टिक गई। ठाकुर ने प्रिया के बाल पकड़े और धीरे से नीचे झुकाया।

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“मुँह खोल।”

प्रिया ने होंठ खोले। लंड उसके मुँह में घुसा। पहले सिरा, फिर और अंदर। वह चूसने लगी—धीरे, फिर तेज़। ठाकुर की साँस गहरी हो गई। कमला उनके पैरों के पास बैठी रही। ठाकुर ने उसका सिर भी खींचा। अब दो मुँह बारी-बारी लंड चाट रहे थे। प्रिया नीचे से अंडकोष चाटती, कमला ऊपर से सिर निगलती। ठाकुर की उंगलियाँ दोनों की चूतों में घुस गईं—एक प्रिया में, एक कमला में। दोनों गीली थीं, फिसलन भरी।

वह प्रिया को पीछे की ओर मोड़कर खड़ा किया। कमला सामने घुटनों के बल। ठाकुर ने प्रिया की चूत में लंड घुसाया—एक झटके में पूरा। प्रिया चिल्लाई, लेकिन आवाज़ कमला के मुँह में दब गई क्योंकि ठाकुर ने कमला का सिर अपनी ओर खींच रखा था। कमला प्रिया के स्तन चाट रही थी जबकि ठाकुर पीछे से प्रिया को ठोक रहे थे। गांड हिल रही थी, चूत रस छोड़ रही थी। ठाकुर कभी प्रिया में, कभी कमला को चटाते। फिर उन्होंने कमला को चारों खाने चित्त लिटाया, प्रिया को उसके चेहरे पर बिठाया। प्रिया की गीली चूत कमला के मुँह पर बैठ गई। ठाकुर ने कमला की टाँगें फैलाईं और अंदर घुस गए।

तीनों का शरीर एक लय में हिलने लगा। ढोल बाहर बज रहे थे, अंदर मांस की आवाज़। प्रिया का दूसरा ओर्गाज्म आया तो वह कमला के बाल नोचने लगी। कमला नीचे से चीख रही थी, ठाकुर के हर धक्के से उसका शरीर उछलता। ठाकुर ने प्रिया को नीचे उतारा, दोनों महिलाओं को आमने-सामने लिटाया, उनके कूल्हे उठाए। पहले प्रिया की गांड में उंगली, फिर धीरे-धीरे लंड का सिरा। प्रिया का मुँह खुला रह गया। दर्द और सुख एक साथ। ठाकुर अंदर तक गए। कमला ने प्रिया का मुँह चूमा, उसकी जीभ पकड़ी। ठाकुर ने फिर कमला की चूत में शिफ्ट किया, फिर वापस प्रिया की गांड में। आखिर में उन्होंने दोनों के चेहरों पर वीर्य गिराया—गर्म, गाढ़ा, माथे से ठुड्डी तक। दोनों ने चाटा, एक-दूसरे के होंठ साफ किए।

शाम तक तीनों फिर से कपड़े पहन चुके थे। ठाकुर साहब ने कमला के कान में कहा, “आज रात हवेली में रहना।” प्रिया की आँखों में अब डर नहीं, एक और भूख थी।

रात को बड़े कमरे में दिया जला। चारपाई पर प्रिया नंगी लेटी, कमला उसके बीच में। ठाकुर दोनों के ऊपर। इस बार धीरे शुरू हुआ। चुंबन, चाटना, उंगलियाँ, फिर फिर से लंड। प्रिया ने ठाकुर का मुँह अपनी चूत पर दबाया जब तक वह काँप नहीं गई। कमला ने ठाकुर को मुँह में लिया जब तक गला भर नहीं गया। फिर दोनों महिलाएँ एक-दूसरे को चाटती रहीं जबकि ठाकुर बारी-बारी अंदर जाते रहे। आधी रात तक कमरा पसीने और रस की गंध से भर गया। कई बार ओर्गाज्म आए। आखिर में तीनों एक-दूसरे से लिपटे सो गए।

अगले दिन त्योहार जारी रहा। बाहर रंग और भीड़। अंदर हवेली के बंद कमरों में वही तीन शरीर फिर मिलते रहे। कभी रसोई के पीछे, कभी अंधेरे गोदाम में। प्रिया बहू अब सिर्फ बहू नहीं रह गई थी। कमला सिर्फ नौकरानी नहीं। और ठाकुर हरि सिंह की हवस अब एक नहीं, दो शरीर माँगती थी।

गाँव वाले ढोल सुनते रहे। हवेली के अंदर एक और ताल चलता रहा—गर्म, गीला, और अंतहीन।



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