बेटे बिना कंडोम चोदो, अंदर मत गिराना | Salty Vixen

बेटे बिना कंडोम चोदो, अंदर मत गिराना | Salty Vixen

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दिल्ली की उस रात माँ कीर्ति अकेली सोफे पर लेटी थी। पैंतालीस की उम्र में भी शरीर तना हुआ था। बड़े स्तन, पतली कमर, काला लingerie। बेटा रोहित ऑफिस से लेट आया। एग्जीक्यूटिव था, थका हुआ, थोड़ा पिया हुआ। पापा की अनुपस्थिति में घर में सिर्फ़ माँ-बेटा थे।

कीर्ति ने आँखें उठाईं। “रोहित, इतनी रात गए?”

रोहित ने टाई खोली। नज़र माँ के जाँघिया पर अटक गई। “माँ, आज बहुत गर्मी है।”

वह पास बैठ गया। हाथ माँ की जाँघ पर चला गया। कीर्ति सहम गई फिर भी हटी नहीं। सालों से छुई नहीं गई थी। बेटे का हाथ ऊपर गया, पैंटी के इलास्टिक तक।

“बेटा… यह गलत है। मैं तेरी माँ हूँ।”

रोहित ने चेहरा पेट पर रख दिया। “माँ, सिखा दो। मैं नहीं जानता औरतों को कैसे छूना है। बिना कंडोम चोदना है लेकिन अंदर नहीं गिराना। तुम सिखा दो।”

कीर्ति की साँस तेज़ हो गई। निषिद्ध माँ बेटा प्रेम का विचार आते ही चूत गीली हो गई। उसने धीरे से पैंटी खिसकाई। “पहले देख। यह चूत है। धीरे छू।”

रोहित की उंगली लगी। गर्म, गीली। उसने जीभ निकाली और चाटने लगा। देसी माँ बेटा सेक्स की पहली रात यहीं से शुरू हुई। कीर्ति की कमर उठी। “हाँ… वहीं चाट… चूत के ऊपर वाली बटन को।”

रोहित ने दो उंगलियाँ अंदर डाल दीं। माँ की चूत कस गई। “माँ कितनी टाइट है।”

कीर्ति ने उसके बाल पकड़े। “अब लंड निकाल। मैं चुसती हूँ। सीख जा कैसे औरत लंड लेती है।”

रोहित ने पैंट खोली। बेटे का मोटा लंड बाहर आया। विशाल-लंड, नसें फूली हुई। कीर्ति झुकी। पहले सिर चाटा, फिर मुँह में लिया। ब्लोजॉब धीरे शुरू हुआ। गला तक ले गई तो आँखों में पानी आ गया फिर भी रुकी नहीं।

“ओई माँ ओई माँ… ऐसे ही चूसो।”

कीर्ति ने लंड निकाला। “अब बिना कंडोम डाल। लेकिन सुन, अंदर मत गिराना। बाहर निकालना। समझा?”

रोहित ने सिर हिलाया। माँ को सोफे पर लिटाया। जाँघें कंधे पर चढ़ाईं। लंड का सिर चूत पर रखा और धीरे घुसाने लगा। कीर्ति चिल्लाई। “आह… रुक… बहुत मोटा है।”

थोड़ा-थोड़ा अंदर गया। पूरा लंड चूत में समा गया। दोनों हाँफने लगे। परिवार टैबू टूट चुका था। रोहित हिलने लगा। पहले धीरे, फिर तेज़। सोफे की आवाज़ आने लगी।

“माँ सिखा रही हो ना? ऐसे ही जोर से मारूँ?”

कीर्ति ने नाखून उसकी पीठ पर गड़ाए। “हाँ… और तेज़… चूत फाड़ दे लेकिन अंदर का माल मत डाल।”

रोहित ने एक स्तन मुँह में लिया। बड़े स्तन चूसना शुरू किया। कीर्ति पागल सी हो गई। पहला ऑर्गेज्म आ गया। चूत सिमकने लगी। रोहित निकला नहीं। बाहर खींच लिया। लंड चूत के रस से चमक रहा था।

कीर्ति ने हाथ से पकड़ा। “हैंडजॉब दे रही हूँ। सीख जा कब बाहर निकालना है।” तेज़ मसलने लगी। रोहित का माल माँ के स्तनों पर गिर गया।

उस रात तीन बार और हुआ। कभी किचन काउंटर पर, कभी बाथरूम की दीवार से लगाकर। हर बार कीर्ति दोहराती, “बिना कंडोम चोदो बेटा, अंदर मत गिराना।”

सुबह कीर्ति आईने में खड़ी थी। गर्दन पर निशान, चूत सूजी हुई। शर्म थी लेकिन मन नहीं भरा था। रसोई में रोहित तौलिया बाँधे चाय बना रहा था। कीर्ति पीछे से आई और तौलिये के ऊपर से लंड मसलने लगी।

“आज ऑफिस मत जा। आज पूरा दिन सिखाऊँगी।”

दोपहर को बाथरूम में दरवाज़ा खुला छोड़ दिया। रोहित अंदर गया। गीले बदन पर हाथ फेरे। दो उंगलियाँ चूत में डाल दीं। फिर खड़े-खड़े लंड घुसा दिया। पानी गिर रहा था दोनों पर।

“माँ नहाते हुए भी गीली हो।”

कीर्ति ने पैर उसकी कमर पर लपेट लिए। “जोर से मार। दर्द भी अच्छा लग रहा है।”

शाम को काला लingerie पहना। ब्रा, पैंटी, स्टॉकिंग्स। रोहित बिस्तर पर लेटा था। कीर्ति ऊपर चढ़ गई। पैंटी सरकाकर लंड पर बैठ गई। गोलाई में हिलने लगी।

“देख बेटा तेरी माँ कैसे चुदवा रही है।”

रोहित ने ब्रा खोली। स्तन मुँह में भरे। काटा भी। कीर्ति तेज़ हो गई। फिर रोहित ने नीचे गिराया। मिशनरी। पैर कंधे पर। गहरी चुदाई। बिस्तर खटखटा रहा था।

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कीर्ति के मुँह से निकल रहा था, “चोद… चोद… माँ की चूत बेटे ने मारी… ओई बेटा…”

रोहित गले पर हल्का हाथ रखा। कीर्ति और गीली हो गई। लंड निकालकर मुँह पर रखा। “चूस माँ। अपनी चूत का रस लगा है।”

कीर्ति ने पूरा गला तक लिया। आँखें पानी से भर आईं। थोड़ी देर बाद गाँड ऊपर की। कीर्ति तन गई। “धीरे… पहली बार है।”

रोहित ने पहले उंगली डाली, फिर लंड का सिर। धीरे घुसाया। आधा अंदर। फिर पूरा। कीर्ति तकिया काट रही थी। “बेटे ने माँ की गाँड मार ली…”

रोहित ने निकाला और चूत में डालकर बाहर ही माल गिराया। कीर्ति ने दोहराया, “याद रख, अंदर नहीं।”

अगले दिनों यह रोज का हो गया। सुबह रसोई, दोपहर कमरा, शाम लिविंग रूम। कभी रोहित लेट आता तो कीर्ति लingerie में दरवाज़े पर खड़ी मिलती। गुप्त संबंध माँ बेटा अब घर का राज़ था।

एक रात कीर्ति ने कहा, “आज पूरा कंट्रोल तुझे देती हूँ। जो चाहे कर। बस अंदर मत गिराना।”

रोहित ने हाथ ऊपर रखने को कहा। मुँह पर बैठकर चूत चटवाई। स्तनों के बीच लंड रगड़ा। उठाकर दीवार से लगाया। हर कोना इस्तेमाल हुआ। सोफा, डाइनिंग टेबल, रात की बालकनी।

कीर्ति खुद गंदी बातें करने लगी। “आज चूत को कच्चा कर दे। कल बाहर नहीं जाना।”

रोहित कभी बर्फ की डली चूत पर फेरता, कभी तेल लगाकर लंबी मालिश के बाद चुदाई करता। कीर्ति का बदन अब बेटे के हाथों का आदि हो चला था। जैसे ही दरवाज़ा खुलता चूत गीली हो जाती।

एक रात कीर्ति ने सोते हुए रोहित का लंड मुँह में लिया। नींद में खड़ा हो गया। फिर ऊपर चढ़कर खुद हिलने लगी। रोहित जागा। “माँ रात को भी नहीं छोड़ती।”

कीर्ति मुस्कुराई। “तेरी माँ को अब रोज़ चुदना है। तू ही तो है।”

महीनों बीत गए। बाहर माँ-बेटा, अंदर हर रात चुदाई। हिंदी सेक्स कहानी जैसी ज़िंदगी जी रहे थे। कीर्ति कभी सोचती यह कितना पाप है। फिर लंड अंदर जाते ही सब भूल जाती।

रोहित कहता, “माँ शादी नहीं करूँगा। तू ही काफ़ी है।”

कीर्ति चुप हो जाती। फिर लंड पकड़कर मुँह में ले लेती। जवाब उसी तरह देती।

एक रात लाल लingerie, हील्स। रोहित ने उठाकर दीवार से लगाया। एड़ी पर ही चोदा। कीर्ति के नाखून पीठ में चुभे। “बेटा आज बहुत गहरा जा रहा है।”

“माँ आज बीच में नहीं निकालूँगा लंड, माल बाहर गिराऊँगा।”

सारी रात चली। अलग कमरे, अलग पोज़। सुबह पाँच बजे आखिरी बार सोफे पर। कीर्ति के पैर फैले। रोहित घुटनों के बल। धीरे क्योंकि दोनों थक चुके थे फिर भी रुकना नहीं चाहते थे।

कीर्ति ने उसका चेहरा पकड़ा। “इतना प्यार से मत देख। चोदता रह। बिना कंडोम। अंदर नहीं।”

रोहित मुस्कराया और धीरे धक्के मारता रहा जब तक दोनों फिर से नहीं निकल गए। लंड चूत से निकलते ही माल माँ की जाँघों पर गिरने लगा।

दिल्ली के उस छोटे फ्लैट में यह सिलसिला चलता रहा। दरवाज़े के उस पार कोई नहीं जानता था माँ बेटा चुदाई कहानी कैसे हर रात दोहराई जाती है। कीर्ति लingerie बदल-बदलकर इंतज़ार करती। रोहित आता और पैंटी सरकाकर बिना पूछे डाल देता।

कभी लिफ्ट में लगभग हो जाता, रुक जाते। कभी मंदिर वाली पुरानी बातें याद करके और उत्तेजित हो जाते, फिर बिस्तर पर उतर आते।

कीर्ति अब साफ़ कहती, “बेटे बिना कंडोम चोदो। माँ की चूत सीख चुकी है तुम्हारा लंड लेना। बस अंदर मत गिराना।”

और रोहित हर बार वही करता। सिखा हुआ बेटा। माँ की बनाई हुई चाल। घर के अंदर सिर्फ़ दो आवाज़ें गूँजतीं—चूत की गीली आवाज़ और माँ की फुसफुसाहट।

ओई माँ ओई माँ। और बाहर निकालता हुआ गरम माल।



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