मम्मी बेटा चुदाई अशोक काल की वर्जित कामाग्नि by Salty Vixen

मम्मी-बेटा चुदाई: अशोक काल की वर्जित कामाग्नि by Salty Vixen

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अध्याय १: महल की अकेली रानी

सम्राट अशोक के शासनकाल में, जब पूरा भारत बौद्ध धर्म की छाया में था, पाटलिपुत्र से कुछ दूर एक समृद्ध सामंत राजा वीरसेन का विशाल महल था। राजा वीरसेन अक्सर सीमांत युद्धों में व्यस्त रहते। उनकी रानी पद्मावती महल की स्वामिनी थीं। पद्मावती की उम्र ३८ वर्ष थी, लेकिन उनकी देह ऐसी थी मानो देवी लक्ष्मी अवतरित हुई हों। लंबे घने काले बाल कमर तक, मटमैला गोरा रंग, भारी-भारी स्तन जो साड़ी फाड़कर बाहर आने को बेताब रहते, पतली कटि, चौड़े नितंब और मांसल जांघें। उनकी चाल में एक अजीब सी कामुकता थी जो महल के किसी भी पुरुष को पागल कर सकती थी।

उनका इकलौता पुत्र विक्रम १९ वर्ष का जवान योद्धा था। बचपन से ही वह मां की गोद में पला-बढ़ा था। मां के स्तनों से दूध पीते समय ही उसकी पहली कामेच्छा जागृत हुई थी। अब वह जवान हो चुका था। उसका शरीर कठोर, लिंग लंबा और मोटा। वह रात-रात भर मां के बारे में सोचकर मुठ मारता।

एक गर्मी की शाम, महल के संगमरमर के स्नान कुंड में रानी पद्मावती नहा रही थीं। उनके शरीर पर सिर्फ हल्का सा उज्जैन का रेशमी वस्त्र था जो पानी में भीगकर पारदर्शी हो गया था। उनके गुलाबी चूचियां सख्त होकर बाहर निकल रही थीं, योनि के ऊपर घने काले बाल पानी में भीगकर चिपक गए थे।

विक्रम छिपकर देख रहा था। उसका लिंग धोती फाड़ने को तैयार। “मां… तुम्हारी चूत कितनी सुंदर है…” वह फुसफुसाया और अपने मोटे लिंग को सहलाने लगा।

पद्मावती को अहसास हो गया। उन्होंने मुड़कर देखा, “विक्रम! बेटा, तू यहां क्या कर रहा है? शर्म नहीं आती अपनी मां को इस तरह देखते हुए?”

विक्रम डर गया लेकिन मां की आंखों में गुस्सा नहीं, बल्कि प्यास थी। पद्मावती ने हाथ बढ़ाया, “आ बेटा… पास आ। मां अकेली है। तेरे पिता महीनों से नहीं आए।”

विक्रम कुंड में उतरा। पद्मावती ने बेटे को गले लगाया। उनके भारी स्तन बेटे की छाती से दब गए। विक्रम ने हिम्मत कर मां के होंठ चूस लिए। पद्मावती पहले चौंकीं फिर आंखें बंद कर जीभ मिला दी। लंबी गहरी चुम्बन चली।

“मां… मैं तुम्हें चाहता हूं…” विक्रम ने मां के स्तन दबाए। दूधिया सफेद मांस उंगलियों में फंस गया।

पद्मावती ने बेटे की धोती खोली। “अरे बेटा… तेरा लौड़ा तो घोड़े जैसा है। इतना मोटा और लंबा।” उन्होंने घुटनों के बल बैठकर मुंह में ले लिया। गर्म, गीला मुंह। जीभ लिंग के सिरे पर घुमाई। विक्रम मां के बाल पकड़कर जोर-जोर से मुंह में धकेलने लगा। “मां… चूसो… पूरा मुंह भर दो…”

कुछ ही मिनट में विक्रम का वीर्य मां के गले में उछला। पद्मावती ने पूरा पी लिया। “ये मां का पहला स्वाद था बेटा। अब चल, मेरी चूत भर।”

अध्याय २: पहली रात की चुदाई

महल के शयनकक्ष में मोमबत्तियों की रोशनी थी। पद्मावती पूरी नंगी लेटीं। टांगें चौड़ी फैलाईं। उनकी चूत गीली चमक रही थी। विक्रम उनके ऊपर चढ़ा। उसने मां की चूत पर लिंग रगड़ा।

“मां… मैं अंदर जा रहा हूं…”

एक जोरदार धक्का। “आहहह…” पद्मावती चीखीं। बेटे का मोटा लिंग उनकी टाइट चूत को फाड़ता हुआ अंदर चला गया। “बेटा… बहुत मोटा है… धीरे… आह… पूरा भर गया…”

विक्रम ने तेजी से धक्के मारे। चप-चप-चप आवाजें पूरे कमरे में गूंज रही थीं। पद्मावती के स्तन उछल-उछलकर बेटे के मुंह में आ रहे थे। विक्रम चूसता, काटता।

“मां… तुम्हारी चूत स्वर्ग है… कितनी गरम… कितनी चिपचिपी…”

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“हां बेटा… जोर से चोद मां को… तेरे पिता कभी इतना जोर नहीं देते… फाड़ डाल अपनी मां की चूत… आह… मैं झड़ रही हूं…”

पद्मावती की चूत सिकुड़ी। वे झड़ गईं। विक्रम ने और तेज किया। आखिरकार उसने मां की गर्भाशय तक वीर्य उंडेल दिया। “मां… ले… मेरा वीर्य… तुझे गर्भवती कर दूंगा…”

दोनों थककर लिपटकर सो गए। लेकिन रात में दो बार और चुदाई हुई।

अध्याय ३: दिन-रात की काम लीला

अगले कई दिनों तक मां-बेटे का सिलसिला चलता रहा। सुबह स्नान कुंड में, दोपहर बगीचे की झाड़ियों में, शाम पूजा कक्ष में।

एक दिन पद्मावती ने बेटे को सिखाया, “चूत चाटना सीख बेटा।” उन्होंने विक्रम को लिटाया और अपनी चूत उसके मुंह पर रख दी। विक्रम जीभ अंदर डालकर चाटने लगा। मीठा रस निकल रहा था। पद्मावती कूल्हे हिलाकर चूत रगड़ रही थीं। “हां बेटा… जीभ अंदर डाल… चूस मेरी चूत को… आह… मां झड़ गई…”

फिर पद्मावती घोड़ी बन गईं। विक्रम पीछे से चोदने लगा। गांड के दोनों फूल उछल रहे थे। “मां… तेरी गांड भी चोदनी है…”

पद्मावती ने तेल मंगवाया। विक्रम ने धीरे से गांड में डाला। “आह… दर्द हो रहा है बेटा… लेकिन रुकना मत… पूरी गांड भर दे…”

जोर-जोर से गांड चुदाई चली। विक्रम ने गांड में वीर्य भर दिया।

अध्याय ४: गर्भावस्था की चुदाई

तीन महीने बाद पद्मावती गर्भवती हो गईं। पेट थोड़ा उभर आया था। स्तन और भारी हो गए, दूध आने लगा। विक्रम रोज मां के स्तनों से दूध पीता और फिर चोदता।

“बेटा… गर्भ में तेरा बच्चा है… फिर भी चोद मुझे…”

पद्मावती चारों खाने चित लेटीं। विक्रम ऊपर। धीरे-धीरे चोदाई। स्तनों से दूध निकल रहा था। विक्रम पीता जाता। “मां… तुम्हारी चूत अब और गीली हो गई है…”

रात को नई मुद्राएं आजमाईं। कभी विक्रम नीचे, मां ऊपर घुड़सवारी। कभी दोनों साइड में लेटकर। पद्मावती की चीखें महल की दीवारों से टकरातीं।

अध्याय ५: दासी का शामिल होना और त्रिगुट

एक दासी लक्ष्मी को सब पता चल गया। पद्मावती ने उसे धमकाया नहीं, बल्कि शामिल किया। अब तीनों साथ खेलते।

लक्ष्मी मां की चूत चाटती, विक्रम मां को चोदता। फिर विक्रम लक्ष्मी को चोदता जबकि पद्मावती बेटे के लिंग को चूसती। तीनों की मिली-जुली चुदाई। कमरे में वीर्य और रस की महक।

“मां… तेरी चूत और इस दासी की चूत… दोनों मेरी हैं…”

अध्याय ६: उत्सव की रात और खुली वासना

अशोक काल के महोत्सव में पूरा महल जश्न मना रहा था। रानी पद्मावती और विक्रम गुप्त सुरंग से एकांत कक्ष में गए। वहां उन्होंने पूरी रात चुदाई की। हर मुद्रा आजमाई। विक्रम ने मां को दीवार से सटाकर, घुटनों पर, उल्टा लटकाकर चोदा।

“मां… तू मेरी रंडी है… मेरी चूत की मालकिन… हमेशा भरूंगा तुझे…”

पद्मावती चीख-चीखकर झड़ती रहीं। “हां बेटा… मां तेरी गुलाम है… चोद… फाड़… गर्भवती कर… आहहह…”

Tip Salty Vixen