जम्बुपुरा की नई राजधानी नौवीं शताब्दी की धूप में चमक रही थी। पत्थर के विशाल किले, ऊँची दीवारें, घने जंगल और नदी के किनारे बने महल। राजा विक्रमादित्य का शासन था, लेकिन महल के अंदर साँप फुंफकार रहे थे। उत्तरी राज्य के शत्रु राजा को मारकर जम्बुपुरा का सिंहासन छीनना चाहते थे। साजिश इतनी गहरी थी कि सेना के जनरल तक शामिल थे।
उच्च सलाहकार चंद्रगुप्त ने सब पता लगा लिया। उसने एक आदमी को बुलाया—वीरसिंह। वीरसिंह कोई साधारण जासूस नहीं था। वह रानी सुमित्रा का अपना बेटा था। सालों पहले सुरक्षा के लिए उसे दूर भेज दिया गया था। अब वह वापस आया था, पर किसी को पता नहीं चलना चाहिए था कि वह राजकुमार है। वह महल में एक साधारण सेवक और गुप्तचर बनकर घुसा।
रानी सुमित्रा अभी भी बेहद सुंदर थीं। उम्र तीस के पार थी, लेकिन शरीर जवान। भरी हुई गोल छातियाँ, पतली कमर, चौड़ी कमर और गोल-मटोल गांड। चूत सालों से तरस रही थी क्योंकि राजा बूढ़ा और कमजोर हो चुका था। रात को रानी अकेली पलंग पर करवटें बदलती रहती थीं।
पहली मुलाकात रात को हुई। वीरसिंह रानी के निजी कक्ष में रिपोर्ट देने गया। दरवाजा बंद होते ही रानी ने उसे घूरकर देखा। आँखों में पहचान थी।
“तुम… मेरे बेटे हो?” रानी की आवाज काँप रही थी।
वीरसिंह ने सिर झुकाया। “हाँ माँ। पर अब मैं सिर्फ जासूस हूँ। कोई नहीं जानना चाहिए।”
रानी पास आईं। उनकी साड़ी का पल्लू सरक गया। बड़ी-बड़ी छातियाँ बाहर झाँकने लगीं। वीरसिंह का लंड तुरंत सख्त हो गया। रानी ने उसकी आँखों में देखा और धीरे से बोलीं, “मैंने तुम्हें इतने सालों से नहीं देखा… अब तुम इतने मजबूत, इतने मर्द हो गए हो।”
उसने वीरसिंह का हाथ पकड़कर अपनी छाती पर रख दिया। “छू लो बेटा… माँ की छातियाँ तुम्हारी हैं।”
वीरसिंह का दिमाग घूम गया। वह अपनी माँ की नरम, भारी छातियों को मसलने लगा। निप्पल सख्त हो गए। रानी कराह उठीं। “आह… बेटा… और जोर से दबा… माँ को अच्छा लग रहा है।”
वीरसिंह ने साड़ी खींच दी। रानी नंगी हो गईं। उनकी चूत पहले से गीली चमक रही थी। उसने माँ को पलंग पर लिटाया और उनके पैर फैला दिए। अपनी जीभ चूत पर लगाई। रानी की टाँगें काँपने लगीं।
“हाँ बेटा… माँ की चूत चाट… जोर से चूसो… अंदर तक जीभ डालो…”
वीरसिंह ने चूत के अंदर जीभ घुसाई, चूसने लगा, चूत के ऊपर वाले हिस्से को दाँतों से हल्का काटा। रानी की गांड भी हिल रही थी। उसने एक उंगली गांड में डाल दी। रानी चीख पड़ीं, “आह्ह्ह… गांड में… बेटा… माँ की गांड भी चुदो!”
वीरसिंह ने लंड निकाला। मोटा, लंबा, नसों से भरा। उसने पहले चूत में घुसाया। एक झटके में पूरा अंदर। रानी की आँखें फटी की फटी रह गईं।
“माँ… तुम्हारी चूत कितनी टाइट और गर्म है…”
वह जोर-जोर से ठोकने लगा। पलंग चरमरा रहा था। रानी के स्तन उछल रहे थे। वीरसिंह ने उनकी गांड के गोल हिस्से को दोनों हाथों से पकड़कर और गहरा धकेला।
“चोदो बेटा… जोरदार चूत चुदाई करो… माँ को पागल बना दो… और तेज… और जोर से!”
वीरसिंह ने लंड निकाला और गांड पर लगा दिया। धीरे-धीरे गांड की सूराख में घुसाने लगा। रानी दर्द और मजे से कराह रही थीं।
“आह्ह्ह… गांड फट रही है… पर मत रुको… पूरा डालो… माँ की गांड तुम्हारी है!”
पूरा लंड गांड में समा गया। वीरसिंह ने जोरदार गांड चुदाई शुरू कर दी। हर धक्के पर रानी की गांड लपलपा रही थी। वीरसिंह ने माँ के बाल पकड़कर खींचे और और तेज ठोका।
“ले माँ… तेरी गांड मेरी हो गई… आज से रोज चुदूंगा… चूत भी, गांड भी!”
रानी झड़ गईं। चूत से पानी की धार छूट गई। वीरसिंह ने भी गांड के अंदर ही अपना वीर्य उड़ेल दिया। गर्म-गर्म रस रानी की गांड से बाहर बहने लगा। दोनों हाँफते हुए लेटे रहे।
अगले कई दिनों तक यही सिलसिला चला। दिन में वीरसिंह साजिश का पता लगाता—पत्र काटता, भेष बदलता, रात को रानी के कक्ष में घुसकर माँ की चूत और गांड दोनों को रौंदता। कभी रानी खुद घुटनों के बल बैठकर बेटे का लंड चूसतीं, कभी उसे अपनी छातियों के बीच दबाकर मलाई निकालतीं। कभी वीरसिंह माँ को घोड़ी बनाकर चूत में धंसता, कभी खड़ा करके दीवार से सटाकर गांड में।
एक रात रानी ने दो युवा दासियाँ भी बुला लीं। “बेटा, आज थ्रीसम होगा। माँ और दो दासी… तुम्हारा लंड सबको चुदेगा।”
तीनों औरतें नंगी हो गईं। वीरसिंह पहले एक दासी की चूत में घुसा, फिर दूसरी की गांड में, और बीच-बीच में माँ की दोनों होल्स को भी नहीं बख्शा। रानी दासी की चूत चाट रही थीं जबकि बेटा उनकी गांड में धंस रहा था। कमरा कराहों, थप्पड़ों और गीली आवाजों से गूंज रहा था। वीरसिंह बारी-बारी से तीनों की चूत और गांड में वीर्य भरता रहा।
साजिश गहरी निकली। सेना का जनरल खुद गद्दार था। वह रक्षा योजनाएँ बाहर भेज रहा था। वीरसिंह ने सबूत जुटाए। लेकिन जनरल को शक हो गया।
एक रात भव्य शाही भोज में जनरल ने जाल बिछाया। महल के गलियारों में अचानक हमला शुरू हो गया। हत्यारे राजा की तरफ बढ़े। वीरसिंह और रानी साथ लड़े। रानी ने खंजर उठाया, वीरसिंह ने तलवार। दोनों ने गद्दारों को काट डाला। जनरल मारा गया। राजा बच गया। राज्य सुरक्षित हो गया।
लेकिन वर्जित प्रेम का राज अब और गहरा हो चुका था। कानून के अनुसार माँ-बेटे का यह रिश्ता मौत की सजा था। फिर भी रात के अंधेरे में रानी अपने बेटे को बुलाती रहीं।
“बेटा… सिंहासन तो सुरक्षित हो गया… अब माँ की चूत और गांड को हमेशा के लिए अपना बना लो।”
वीरसिंह ने माँ को दीवार से सटाया, साड़ी फाड़ी और एक ही झटके में चूत में धंस गया। फिर गांड में। फिर दोनों होल्स को बारी-बारी से तबाह किया। रानी की चीखें महल की दीवारों में दब गईं। कभी वह माँ को गोद में बिठाकर चूत में बैठाता, कभी माँ को अपने ऊपर बैठाकर गांड में घुसाता। हर रात नई पोजीशन, नई मस्ती।
एक और रात रानी ने कहा, “बेटा, आज सिर्फ गांड। पूरी रात सिर्फ गांड चुदाई। माँ की गांड को फाड़ दो।”
वीरसिंह ने तेल लगाया और घंटों तक माँ की गांड में लंड घुसाए रखा। रानी बार-बार झड़ती रहीं, चूत से पानी बहता रहा, लेकिन लंड गांड में ही रहा। सुबह होने तक रानी की गांड लाल और सूजी हुई थी, लेकिन चेहरे पर संतुष्टि थी।
इस तरह जम्बुपुरा का सिंहासन तो लोहे का रहा, लेकिन रानी सुमित्रा और उनके बेटे वीरसिंह का रिश्ता उससे भी ज्यादा मजबूत और वर्जित हो गया। हर रात माँ की चूत और गांड बेटे के लंड की दासी बनती रहीं—जोरदार, बेरोक-टोक, और कभी न खत्म होने वाली चुदाई के साथ। महल के अंदर साजिश खत्म हो गई थी, लेकिन माँ-बेटे की भूख कभी खत्म नहीं हुई।


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