कबीर तीस साल का है।
गुड़गाँव के उस गेटेड फार्महाउस में तालाब जैसा पूल था, इतालवी टाइल्स, और शाम को वाइन की बोतलें पसीने से ठंडी हो जातीं। अंजलि मेहरा उनतालीस की थीं—मखमली कमर, भारी छातियाँ, रेशमी साड़ी में भी शरीर छिपता नहीं था। पति दुबई में रहते थे। पड़ोस में सबसे करीब सहेली थी प्रिया कपूर, और प्रिया का बेटा कबीर अभी-अभी लंदन से लौटा था। तीस का, कंधे चौड़े, पेट पर वो रेखा जो तैरने वालों की होती है।
अंजलि ने उसे पहली बार पूल में बिना कमीज देखा। पानी टपकता हुआ, तौलिया कमर पर, बाल पीछे किए। वो बालकनी से खड़ी रह गई। पैरों में गरमी उठी जैसे किसी ने हाथ रख दिया हो। रात भर उसी सीने की याद रही। सुबह कॉफी ठंडी हो गई। दोपहर को प्रिया मॉल गई—“मैं तीन बजे तक आऊँगी, तू आराम कर”—और अंजलि ने सफेद साटन का गाउन पहना, नीचे कुछ नहीं, और पूल हाउस की तरफ चल दी।
कबीर किनारे लेटा था, धूप में तेल लगाए। अंजलि की एड़ियाँ टाइल पर बजीं। उसने आँखें खोलीं।
“आंटी…”
“आज आंटी मत बोल।” आवाज़ में शर्म थी और भूख भी। “तेरी माँ को पता नहीं चलना चाहिए कि मैं यहाँ क्यों आई हूँ। लेकिन मैं आई इसलिए आई हूँ।”
कबीर उठा। पानी की बूँदें छाती से फिसलीं। अंजलि का हाथ खुद उसके पेट पर चला गया, फिर नीचे, तैरने वाली शॉर्ट्स के अंदर। भारतीय औरतें जो सर्च करती हैं वही था—मम्मी जैसी उम्र, बेटे जैसा शरीर, निषेध का स्वाद। वो झुककर उसके मुँह में जीभ डाल गई। चूमा गहरा था। कबीर ने गाउन खोला। लंबे निप्पल धूप में तन गए। उसने एक को मुँह में लिया, दूसरे को उँगली से मला। अंजलि की आवाज़ पूल के पानी पर टूट गई।
“सीधे ले चल। सोफे पर नहीं—यहीं तौलिये पर।”
वो लेटी। कबीर ने उसके बीच उँगली की, फिर जीभ। अंजलि की जाँघें उसके कान दबाने लगीं। जब बर्दाश्त नहीं हुआ उसने उसके बाल पकड़कर ऊपर खींचा।
“अंदर। धीरे नहीं। मैं काँच नहीं हूँ।”
कबीर का लंड मोटा था, नसों वाली। अंजलि ने सिर नीचे करके देखा, थूक लगाया, फिर उसे अपने अंदर उतारा। पहली चोट पर उसकी कमर उठी। पूल की रोशनी उनके पेट पर काँप रही थी। कबीर ने उसके स्तन दबाए, निप्पल दाँतों से खींचे, और धक्के तेज़ किए। अंजलि हिंदी में गंदी बातें करने लगी—वही जो लोग रात को सर्च करते हैं—बेटी मत समझ, मुझे चोद, गहरा, माँ को मत छोड़।
वो ऊपर बैठी। गाउन कंधे से फिसला। सोने की चेन छातियों के बीच डोलती रही। कबीर के हाथ उसकी मोटी कमर पर थे। अंजलि ने खुद को ऊपर-नीचे मारा जैसे सालों से भूखी हो। पानी की बूँदें उसके पेट पर गिर रही थीं। वो आ गई, नाखून उसकी पीठ पर, और फिर लेटकर बोली, “मुँह पर मत। अंदर। आज गोली नहीं खाई।”
कबीर रुक गया। “आंटी—”
“अंजलि बोल। और निकाल मत।”
उसने कमर दबाई। कबीर ने एक लंबी साँस में उसके अंदर छोड़ दिया। गर्म, बहुत। अंजलि की उँगलियाँ अपनी चूत पर फिर गईं, उसके रस और उसके पानी को मिलाती हुई।
तभी गेट की चेन खनकी।
प्रिया की एड़ियाँ ड्राइववे पर थीं। शॉपिंग बैग। आवाज़—“कबीर? अंजू?”
अंजलि के चेहरे पर खून उतर गया और फिर चढ़ गया। कबीर निकलना चाहता था। अंजलि ने जाँघें भींच लीं।
“भाग मत। अगर भागोगे तो और गलत लगेगा।”
प्रिया पूल हाउस के काँच से दिख गई—पहले दो शरीर, फिर अपना बेटा अंजलि की जाँघों के बीच, फिर अंजलि का खुला गाउन। बैग गिरे। एक बोतल लुढ़की।
“यह… यह क्या है?”
कबीर ने नाम लिया, “माँ—”
अंजलि ने साड़ी नहीं, साटन ओढ़ते हुए भी शर्म नहीं छिपाई। “प्रिया। देख ले। मैंने तेरे बेटे को चुदाई है। छुपा नहीं सकती।”
प्रिया के हाथ काँपे। गुस्सा था। उसके नीचे और कुछ था—वह नज़र जो सालों की सहेली के स्तनों पर पहले भी ठहरी थी और कभी पूरी नहीं हुई थी। अंजलि ने गाउन और गिराया।
“मार ना। या आ जा। तेरा बेटा अभी कठोर है। और मैं अभी गीली हूँ।”
प्रिया एक कदम अंदर आई। दरवाज़ा बंद किया। ताला लगाया जैसे घर की इज़्ज़त ताले से बचती हो। फिर उसने अंजलि को थप्पड़ नहीं मारा। उसने उसके मुँह पर चुम्बन मारा—गुस्से वाला, दाँत वाला। दो अमीर औरतें पूल हाउस की ठंडी टाइल पर भीग गईं। प्रिया ने अंजलि की छाती मुँह में ली, लंबे निप्पल चूसे, उँगली उसके अभी भरे हुए योनि द्वार में डाली और कबीर का वीर्य महसूस करके एक आवाज़ निकाली जो गुस्सा नहीं, भूख थी।
“मेरे बेटे का… तूने लिया।”
“अब तू भी ले।” अंजलि ने प्रिया की लीनन ड्रेस ऊपर की। प्रिया के नीचे लेस थी, पहले से गहरी। अंजलि झुकी, लेस किनारे की, और सहेली को चाटा। कबीर दीवार से लगा खड़ा रहा, लंड फिर उठता हुआ। प्रिया ने आँखें खोलकर बेटे को देखा। शर्म से गला सूखा। फिर उसने हाथ बढ़ाया।
“यहाँ आ। मुँह मत खोल। आज माँ बोलने वाली नहीं। आज सिर्फ करने वाली है।”
कबीर घुटनों पर आया। प्रिया ने उसका मुँह अपनी छाती पर दबाया, अंजलि ने नीचे से प्रिया को चाटना जारी रखा। लेस्बियन वाला हिस्सा लंबा चला—दो जीभें, दो उँगलियाँ, साड़ियों की जगह महँगे कपड़े फर्श पर, हीरे की अंगूठी कबीर की कमर में उलझी। अंजलि ने प्रिया को चूत पर बैठाया, खुद नीचे लेटी, और प्रिया की गीली माँस को मुँह से खोला। प्रिया कबीर का लंड हाथ में लेकर सहलाती रही, बेटे को देखकर शर्म से काँपती, फिर और कसकर पकड़ती।
“तीनों।” अंजलि ने पेंटिंग की तरह निर्देश दिए। “तू अंदर से आ। कबीर पीछे से नहीं—पहले तेरी माँ को मुँह दे, फिर मुझे चोद, फिर तेरी माँ को।”
कबीर ने माँ के मुँह में धीरे दिया। प्रिया की आँखों में पानी था। अंजलि ने नीचे से प्रिया की छाती दबाई। फिर कबीर अंजलि के ऊपर आया, गर्भवती नहीं वो, मगर पेट नरम, जाँघें खुली, और दूसरी बार घुसा। प्रिया ने अंजलि का मुँह चूमा जबकि उसका बेटा सहेली को चोद रहा था। धक्कों की लय में हीरे की चेन बजती रही।
बारी आई प्रिया की। वो चारपाई नहीं, उस चौड़े डेक-सोफे पर लेटी जो Palms के कैटलॉग से मँगवाया गया था। कबीर ने माँ की टाँगें कंधों पर रखीं। अंजलि ने उसके निप्पल मुँह में लिए और कबीर से कहा, “देख के। ये तेरी माँ है। रुक-रुक के पूछ। लेकिन रुक मत।”
प्रिया फटी आवाज़ में आई। कबीर बाहर निकला, अंजलि के मुँह पर रखा, अंजलि ने चाटा, फिर प्रिया के पेट पर छोड़ दिया। सफेद रेखा साँवली त्वचा पर। अंजलि ने जीभ से चाट लिया। प्रिया ने अंजलि का मुँह पकड़कर अपना रस और बेटे का पानी दोनों चखा।
वे तीनों फर्श पर पड़े रहे। पूल का फ़िल्टर चलता रहा। बाहर माली की कतरन की आवाज़ दूर थी। अमीरी का फ़ायदा यही था—दीवारें ऊँची थीं, नौकर दूर रहते थे, और सच्चाई ताले के अंदर सो सकती थी।
प्रिया ने आँखें बंद किए बिना कहा, “यह दोबारा नहीं होगा।”
अंजलि मुस्कराई। “कल दोपहर पूल की छुट्टी है। तू मॉल जा। या मत जा। दोनों हाल में मैं आऊँगी।”
कबीर चुप था। उसकी उँगली माँ की कलाई पर थी, दूसरी अंजलि की जाँघ पर। तीस का आदमी, दो मम्मी जैसी औरतें, और वो घर जो बाहर से संस्कार दिखाता था।
रात को तीनों ने अलग-अलग शावर लिए। अंजलि अपने बंगले लौटी, खिड़की से पड़ोस का पूल देखा, और हाथ साड़ी के अंदर ले गई। सर्च वाली भूख अब शरीर में थी—सहेली का बेटा, सहेली की जीभ, और वो थ्रीसम जो इज़्ज़त के नीचे छिपकर भी साफ़ दिखाई देता था।
दूसरे दिन प्रिया मॉल नहीं गई। तीनों फिर पूल हाउस में मिले। इस बार नियम थे। दरवाज़ा बंद। फोन साइलेंट। कबीर पहले अंजलि, फिर माँ, फिर दोनों औरतों का मुँह बारी-बारी। अंजलि ने प्रिया को घोड़ी बनाकर चाटा जबकि कबीर पीछे से अंजलि को ले रहा था। प्रिया ने शर्म के मारे तकिया काटा, फिर अंजलि का नाम बुदबुदाया।
यही लूप था अब उनके अमीर, बंद, भूखे घर का।


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