दिल्ली की तपती गर्मी से भागकर सतबीर और उसकी जुड़वा बहन सरोज हरियाणा के छोटे से गाँव पहुँचे। बस स्टैंड से इक्के पर बैठकर वे उस कच्चे रास्ते से गए जहाँ दोनों तरफ बाजरा और गन्ना लहरा रहा था। चाचा की मौत के तीन महीने हो चुके थे। चाची बिमला अकेली पूरे खेत सँभाल रही थीं। पैंतालीस की उम्र में भी उनका शरीर मजबूत था—भारी स्तन, चौड़ी कमर, मोटी जाँघें और वह देहाती चाल जो शहर के लड़कों को घूरने पर मजबूर कर देती।
सतबीर बाईस का था, कंधे चौड़े, हाथ मज़बूत, और उसकी लंड बचपन से ही गाँव के लड़कों से मोटी और लंबी थी। खड़ी होने पर वह कलाई से भी मोटी लगती। सरोज भी बाईस की, गोरी चमड़ी, गोल कमर, बड़े स्तन और वही बड़ी-बड़ी आँखें जो चाची जैसी थीं।
पहला हफ्ता सामान्य रहा। सुबह चार बजे उठना, भैंस दुहना, खेत में पानी लगाना, दोपहर की नींद चारपाई पर, शाम को लस्सी और बाजरे की रोटी। लेकिन गर्मी बढ़ती गई। पंखे काम नहीं कर रहे थे। रात को पसीने से कपड़े चिपक जाते।
एक दोपहर सतबीर कुएँ की तरफ गया पानी पीने। बिमला नहा रही थीं। साड़ी का पल्लू एक तरफ था, स्तन पूरी तरह बाहर, पानी उनके भारी शरीर पर बह रहा था। सतबीर छिपकर देखता रहा। उसकी लंड तुरंत खड़ी हो गई, पैंट में तंबू बनाती। बिमला ने उसे देख लिया लेकिन कुछ नहीं कहा। सिर्फ नज़रें मिलीं और उन्होंने जानबूझकर साड़ी और सरका दी।
उस रात तीनों एक ही कमरे में सोए क्योंकि दूसरा कमरा टूटा हुआ था। चारपाई पर बिमला बीच में, एक तरफ सतबीर, दूसरी तरफ सरोज। पसीना, गर्मी, और साँसें। सतबीर की लंड कंबल के नीचे पूरी तरह सख्त थी। सरोज ने महसूस किया। उसने धीरे से हाथ बढ़ाया और भाई की मोटी लंड को पकड़ लिया।
“भैया… ये तो बहुत बड़ी हो गई है,” सरोज ने फुसफुसाया।
बिमला जाग गईं। अंधेरे में उनकी आवाज़ भारी निकली, “दिखा तो सही, बेटा। चाची देख ले।”
सतबीर ने कंबल हटाया। मोटी, नसों वाली लंड खड़ी थी, सिर चमकीला। बिमला ने हाथ बढ़ाया और पकड़ा। “राम-राम… तेरे चाचा की इतनी मोटी नहीं थी। आ जा पास।”
सरोज ने पहले मुँह लगाया। उसने सिर को चाटा, फिर धीरे-धीरे मुँह में लिया। गला तक गई तो गिगियाई। बिमला ने भतीजी के सिर को दबाया, “और ले, साली। भाई की लंड पूरी निगल।”
फिर बिमला खुद झुकीं। दोनों हाथों से पकड़कर उन्होंने सतबीर की लंड मुँह में भरी। गहरी, गीली आवाज़ें निकलीं। गला तक ले गईं, आँखों में पानी आ गया फिर भी नहीं छोड़ा। सतबीर की उँगलियाँ चाची के बालों में धंस गईं। वह कराह उठा।
बिमला ने साड़ी पूरी उतार दी। भारी स्तन लटक रहे थे, निप्पल काले और सख्त। उन्होंने टाँगें फैला दीं। उनकी चूत पहले से गीली थी, बाल घने। “आ जा बेटा, चाची की चूत में डाल। बहुत दिन हो गए।”
सतबीर उनके बीच घुसा। सिर अंदर गया तो बिमला जोर से कराह उठीं। “अरे बाप रे… फट जाएगी… इतनी मोटी…” फिर भी उन्होंने कमर उठाई। सतबीर ने पूरा धकेला। लंड अंदर तक चली गई। बिमला की आँखें बंद हो गईं।
वह जोर-जोर से पेलने लगा। चारपाई चरमरा रही थी। हर धक्के पर बिमला की चूत से पानी निकल रहा था, आवाज़ गंदी और तेज़। सरोज पास बैठकर देख रही थी, अपनी उंगलियाँ अपनी चूत में डाले। “चाची की चूत कितनी फैल गई भैया की लंड से…”
सतबीर ने चाची के स्तन मसलते हुए और तेज़ किया। बिमला चिल्ला रही थीं, “मार… और जोर से मार बेटा… चाची की चूत फाड़ दे…”
वह अंदर ही आया। गाढ़ा, गर्म वीर्य उनकी चूत में भर गया, इतना कि जब उसने निकाला तो सफेद धारा बह निकली, जाँघों पर, चारपाई पर। बिमला ने उंगलियों से उसे समेटा और चाटा। “तेरा वीर्य मीठा है, बेटा।”
सरोज अब बर्दाश्त नहीं कर सकी। उसने सलवार-कमीज़ उतार दी और लेट गई, टाँगें फैलाकर। उसकी चूत छोटी और टाइट थी, बाल मुंडवाए हुए। “अब मेरी बारी भैया। मुझे भी वही मोटी लंड चाहिए। चाची में डालकर देखा, अब मुझमें डाल।”
सतबीर अपनी बहन पर चढ़ा। सरोज इतनी टाइट थी कि सिर घुसते ही वह चीख पड़ी। “आह… बड़ी है… धीरे…” फिर भी उसने टाँगें और फैला दीं। सतबीर ने धीरे-धीरे पूरा अंदर किया। सरोज के नाखून उसकी पीठ में धंस गए।
वह पेलने लगा। गीली आवाज़ें, त्वचा की थपकी। बिमला उनके पास आकर सरोज के स्तन चूसने लगीं, फिर नीचे झुककर देखती रहीं कि कैसे भतीजे की मोटी लंड उनकी भतीजी की चूत को फैला रही है। उन्होंने अपनी जीभ से दोनों के जुड़ाव को चाटा।
सरोज जल्दी आ गई, शरीर काँपता हुआ। सतबीर रुका नहीं। उसने और जोर लगाया और अंदर ही छोड़ दिया। वीर्य बाहर निकलकर सरोज की गाँड की दरार से बहने लगा।
उसके बाद दोनों औरतें एक-दूसरे पर झुकीं। बिमला ने सरोज की चूत चाटी—भाई का ताज़ा वीर्य अभी भी उसमें था। उन्होंने उसे चूसा, चाटा, उंगलियाँ डालीं। सरोज ने चाची की बड़ी, ढीली चूत को चाटा, वीर्य चाटा, क्लिट चूसा। दोनों की जीभें मिलीं, स्तन रगड़ रहे थे। सतबीर खड़ा देख रहा था, लंड फिर से पूरी तरह सख्त।
वह दोनों के बीच आ गया। बिमला ने कुत्ते की पोजीशन पकड़ी। सतबीर पीछे से उनकी चूत में घुसा। सरोज उनके सिर के पास बैठ गई और चाची के मुँह में अपनी चूत रख दी। बिमला भतीजी को चाट रही थीं जबकि भतीजा उन्हें पीछे से पेल रहा था। हर धक्के पर बिमला की आवाज़ सरोज की चूत में दब जाती।
रात भर चला। सतबीर ने चाची की गाँड भी ली। मोटी लंड से उनकी गाँड फैल गई, बिमला चीख रही थीं लेकिन पीछे धकेल रही थीं। सरोज नीचे से चाची की चूत चाट रही थी। फिर उन्होंने जगहें बदलीं। सरोज चाची के ऊपर बैठ गई, चूत से चूत रगड़ते हुए, और सतबीर पीछे से बहन को चोदता रहा।
सुबह तक चारपाई गीली थी, चादरें दागदार। बिमला की साड़ी के नीचे से वीर्य टपक रहा था जब वे चूल्हा जलाने गईं।
अगले दिन खेत में हुआ। दोपहर के खाली समय में बिमला ने सतबीर को गन्ने के खेत में खींचा। उन्होंने घुटनों के बल बैठकर उसकी लंड चूसी, गहरी, दोनों हाथों से मसलते हुए। सरोज पास की मेड़ पर बैठी अपनी चूत सहला रही थी। फिर तीनों मिट्टी पर लेट गए। सतबीर ने पहले चाची को, फिर बहन को चोदा। दोनों औरतें एक-दूसरे के स्तन चूस रही थीं, चूम रही थीं।
एक दोपहर कुएँ के पास। बिमला नहा रही थीं, सतबीर आया और उन्हें दीवार से लगाकर उठा लिया। जाँघों पर बिठाकर चोदा। पानी गिर रहा था, आवाज़ें गूँज रही थीं। सरोज आई और नीचे बैठकर दोनों को चाटने लगी।
रातें एक जैसी हो गईं। खाना खाने के बाद कपड़े उतर जाते। बिमला अब खुलकर बोलतीं—“बेटा, आज चाची की दोनों होल ले ले। चूत और गाँड दोनों भर दे।” सतबीर लेता। कभी सरोज चाची के चेहरे पर बैठ जाती, कभी चाची सरोज के। दोनों औरतें एक-दूसरे को चाटतीं, उंगलियाँ डालतीं, स्तन मसलतीं जबकि सतबीर दोनों को बारी-बारी चोदता।
एक रात सरोज ने चाची से कहा, “चाची, मुझे भी तुम्हारी तरह चोदो… उंगलियों से, जीभ से।” बिमला ने भतीजी को लिटाया, टाँगें कंधों पर रखीं और उनकी चूत को घंटों चाटा, उंगलियाँ अंदर-बाहर कीं, यहाँ तक कि सरोज रोने लगी मज़े से। फिर सतबीर आया और दोनों को एक साथ लिया।
हर बार वह अंदर ही छोड़ता। बिमला की चूत से वीर्य बहता रहता दिन भर। सरोज की जाँघों पर सूखे सफेद दाग। सुबह उठते ही कोई न कोई उसकी लंड चूस रहा होता। कभी चाची, कभी बहन, कभी दोनों साथ।
गर्मियाँ बीतती रहीं। खेत का काम होता, फिर चुदाई। बिमला अब साफ कहतीं, “तुम्हारे चाचा चले गए। अब ये खेत, ये घर, ये दोनों तिजोरियाँ तुम्हारी हैं, बेटा। जब चाहो लो। चाची और तेरी बहन दोनों तैयार रहेंगी।”
सतबीर दोनों को लेता रहा। बार-बार। अंदर तक। मोटी लंड से दोनों की चूतें फैल गई थीं, ढीली हो गई थीं उसके हिसाब से। फिर भी वे माँगतीं। और वह देता। जब तक गर्मी खत्म नहीं हुई, और उसके बाद भी।


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