देसी मम्मी बेटा सेक्स: माँ की चूत में बेटा का लंड द्वारा साल्टी विक्सन

देसी मम्मी बेटा सेक्स: माँ की चूत में बेटा का लंड द्वारा साल्टी विक्सन

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सन् 1537। बाँस-बरेली।

मैं हूँ रानी देविका। जगत सिंह की पत्नी। उम्र अड़तालीस। शरीर अभी भी भारी और गदराया हुआ—बड़े गोल स्तन, चौड़ी कमर, मोटी गांड, और घनी काली झांटों वाली चूत। दो बेटे पैदा किए थे। बड़ा बंसलदेव—क्रूर, लड़ाकू, और शक करने वाला। छोटा बरालदेव—उनतीस साल का, लंबा, मजबूत कंधे, गहरी आँखें, और एक मोटा, लंबा लंड जो मेरी चूत और गांड दोनों को फाड़ने की क्षमता रखता था।

जब बरालदेव पहली बार मेरे बिस्तर पर आया था, तब मैंने सिर्फ़ एक बार मना किया था। “बेटा… यह पाप है। मैं तुम्हारी माँ हूँ।”

उसने मेरे मुँह पर हाथ रख दिया, साड़ी का पल्लू खींचकर फेंक दिया और बोला, “माँ, तुम्हारी चूत की खुशबू मुझे पागल कर रही है। आज मैं अपनी माँ को चोदूँगा।”

उसने मेरे स्तनों को दोनों हाथों से दबाया, निप्पल मुँह में लेकर जोर-जोर से चूसा और दाँतों से काटा। मैं कराह उठी। उसके हाथ नीचे गए। उसने मेरी साड़ी ऊपर की, पैंटी फाड़ी और उंगलियाँ मेरी पहले से गीली चूत में डाल दीं। दो उंगलियाँ… तीन… चौथी भी अंदर चली गई। वह अंदर घुमाते हुए बोला, “माँ की चूत कितनी गरम और तंग है… जैसे कभी किसी ने सही से चोदा ही न हो।”

फिर उसने अपना लंड निकाला। मोटा, गरम, नसों से भरा, मुंह पर पहले से पानी टपका रहा था। उसने मेरे पैर कंधों पर चढ़ाए और एक ही झटके में पूरा अंदर तक धकेल दिया। मैं चीखने वाली थी लेकिन उसने मुँह दबा दिया। दर्द और मज़े का मिश्रण था। वह जोर-जोर से धक्के मारने लगा। हर धक्के के साथ मेरे स्तन उछल रहे थे। “माँ… अपनी माँ की चूत फाड़ रहा हूँ… कैसा लग रहा है?”

“बेटा… और जोर से… माँ को चोद… पूरी तरह चोद दे…”

वह झड़ गया। इतना वीर्य छोड़ा कि मेरी चूत से बाहर निकलकर जांघों पर बहने लगा। उसने उंगली से निकाल-निकालकर मेरे मुँह में डाल दिया। “चाट माँ… अपने बेटे का पानी चाट।” मैंने चाटा। फिर उसने मुझे घुटनों के बल करवाया और अपनी अभी भी अधकचरी उठी हुई लंड मेरी गांड पर रगड़ने लगा। थूक लगाकर धीरे-धीरे अंदर धकेला। गांड फटने जैसी दर्द हुई। मैंने तकिया काट लिया। वह पूरी तरह अंदर तक चला गया और फिर से धक्के शुरू कर दिए। “माँ की गांड भी तंग है… आज दोनों छेद ले लूँगा।”

उस रात उसने मुझे तीन बार चोदा—दो बार चूत में, एक बार गांड में। सुबह होते-होते मेरी चूत और गांड दोनों सूज गई थीं और वीर्य से भरी हुई थीं।

शादी का दिन आया। बंसलदेव की शादी काठेरिया कुल की युवती से हुई। मैंने देखा कि बरालदेव की आँखों में जलन थी, लेकिन रात होते ही वह फिर मेरे पास आ गया।

“माँ, आज भाभी के सामने मुस्कुराना पड़ा। लेकिन असली चूत तो तुम्हारी है।”

उसने मुझे बाँस के घने जंगल में ले जाकर एक पुराने पेड़ से सटाया। साड़ी फाड़ दी। उसने मुझे उलटा लटकाया—मेरे पैर उसके कंधों पर, सिर नीचे। इस पोजीशन में उसने मेरी चूत चाटी। जीभ अंदर तक घुसाई, चूत के दोनों होंठों को चूसा, क्लिट पर दाँत से हल्का काटा। मैं कांप रही थी। फिर उसने मुझे सीधा किया, लंड मेरे मुँह में ठूंस दिया। “चूस माँ… गले तक ले।” मैंने आँसू बहते हुए गले तक ले लिया। वह मेरे बाल पकड़कर जोर-जोर से मुँह चोदने लगा। जब वह बाहर निकाला तो लार और उसके पानी से मेरा मुँह चमक रहा था।

फिर उसने मुझे घोड़ी बना दिया। पहले चूत में पूरा लंड डाला, तेज़ गति से चोदा, फिर निकाला और बिना चेतावनी के गांड में धकेल दिया। मैं चीख पड़ी। “आह्ह्ह… बेटा… गांड फट गई… लेकिन मत रुक… और अंदर…” वह दोनों छेद बारी-बारी इस्तेमाल करता रहा। कभी चूत, कभी गांड, कभी दोनों में एक साथ उंगलियाँ। आखिर में उसने मेरी गांड में झड़ते हुए मेरा गला दबाया और कहा, “माँ… अब तुम सिर्फ़ मेरी रंडी हो। रानी नहीं… भाभी नहीं… सिर्फ़ बेटे की रंडी।”

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बंसलदेव को शक हो चुका था। वह दोनों भाइयों के बीच बातें सुनता, नज़रें घुमाता। इसलिए हमने सार्वजनिक रूप से नफरत का नाटक तेज़ कर दिया। मैंने दरबार में बरालदेव को गाली दी, उसने मुझे “बूढ़ी औरत” कहा। लेकिन रात को वह मेरे कमरे में आता और मुझे रस्सी से बाँध देता।

एक रात उसने मेरे हाथ और पैर बिस्तर के चारों कोनों से बाँध दिए। आँखों पर पट्टी बाँधी। फिर उसने मोमबत्ती का गर्म मोम मेरे स्तनों पर टपकाया। मैं तड़प उठी। उसके बाद उसने अदरक का टुकड़ा मेरी गांड में डाला। जलन इतनी तेज़ थी कि मैं रोने लगी। “बेटा… माँ माफ़ कर… जल रही है…”

“सह माँ। आज दर्द और मज़ा दोनों दूँगा।”

उसने जलती गांड में अपना लंड डाल दिया। जलन और भरने का अहसास एक साथ था। वह बहुत देर तक धीरे-धीरे चोदता रहा, बीच-बीच में अदरक और अंदर धकेलता। जब वह झड़ा तो वीर्य की गर्माहट ने जलन को और बढ़ा दिया। फिर उसने पट्टी हटाई, मेरी आँखों में आँखें डालकर बोला, “माँ, तुम्हारी गांड अब सिर्फ़ मेरे लंड की है। कोई और छूने वाला नहीं।”


जगत सिंह बीमार पड़ गया। महल में सन्नाटा और शक दोनों बढ़ गए। बंसलदेव ने एक रात खुलेआम धमकी दी, “अगर मुझे पता चला कि कोई मेरी माँ या मेरी औरत के साथ खेल रहा है तो मैं दोनों का सिर काट दूँगा।”

उस रात बरालदेव मेरे कमरे में आया। दरवाज़ा बंद किया। उसने मुझे उठाकर दीवार से सटाया और खड़े-खड़े चोदने लगा। इतनी तेज़ी से कि दीवार की इंटें खड़खड़ा रही थीं। “माँ… अब फैसला करो। या तो हम बंसलदेव को जहर दें… या फिर यह खेल खून में खत्म हो जाएगा।”

मैंने उसके गले में बाँहें डाल लीं और पसीने से लथपथ शरीर को अपने से चिपका लिया। “बेटा… माँ तैयार है। लेकिन पहले आज रात मुझे इतना चोदो कि मैं सुबह चल भी न पाऊँ। मेरी चूत, गांड और मुँह तीनों को अपने वीर्य से भर दो।”

उसने मुझे बिस्तर पर फेंका। पूरी रात चली। पहले उसने मेरी चूत में मुट्ठी डाली—चार उंगलियाँ, फिर अंगूठा, फिर धीरे-धीरे पूरी मुट्ठी। मैं चीख रही थी, लेकिन उसने दूसरा हाथ मेरे मुँह में ठूंस दिया। मुट्ठी अंदर घुमाते हुए वह बोला, “माँ की चूत अब लंड से नहीं भरती… मुट्ठी चाहिए।” जब मुट्ठी निकाली तो चूत खुली और लाल रह गई। फिर उसने लंड डाला और इतनी जोर से चोदा कि बिस्तर की लकड़ी चरमरा गई।

उसके बाद गांड की बारी आई। उसने तेल लगाया, पहले चार उंगलियाँ डालीं, फिर लंड। इस बार वह पूरा वजन डालकर धक्के मार रहा था। हर धक्के के साथ मेरी गांड की आवाज़ आ रही थी—छप-छप। आखिर में उसने मेरी गांड में झड़ते हुए मेरे बाल खींचे और कहा, “माँ… कल जहर तैयार रखना। आज के बाद तुम सिर्फ़ मेरी हो।”

मैंने उसके वीर्य को अपनी गांड से निकालकर उंगलियों पर लिया और चाटते हुए जवाब दिया, “हाँ बेटा। माँ तुम्हारी रंडी है। सिंहासन भी लेंगे… और एक-दूसरे को भी।”

बाँस-बरेली की उस रात दो पाप पक रहे थे। एक गद्दी का। दूसरा माँ और बेटे का।

और दोनों ही खून की कीमत पर जिंदा रहने वाले थे।



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