जयपुर से तीस किलोमीटर बाहर, एक सूखी अनजानी सी पगडंडी के आखिर में रीमा का खेत था। मिट्टी का कच्चा मकान, टूटी मुंडेर, दो बीघे जमीन जिसमें बाजरा और ज्वार मुश्किल से खड़ा था। पैंतालीस साल की रीमा सुबह से गोबर पतला करके लीपाई कर रही थी। घाघरा घुटनों तक ऊपर उठा रखा था, मोटी गोल जांघें चमक रही थीं। चोली के बटन ढीले थे, भारी स्तन हर बार झुकने पर लगभग बाहर आने को होते।
तभी एक टैक्सी गंदे रास्ते पर आकर रुकी। कबीर उतरा। शहर वाला शेरवानी कुर्ता, महंगे जूते, चेहरे पर नफरत और शर्म की परत। तीन साल बाद बेटा घर आया था।
“माँ… ये क्या है?” कबीर ने तुरंत कहा। “मैं अपने दफ्तर वालों को क्या कहूँ? मेरी माँ गोबर लगाती है? इतनी गरीबी?”
रीमा ने हाथ पोंछे और मुस्कुराई। आँखों में खुशी और शर्म दोनों थे। “बेटा आ गया… आजा अंदर। पानी पियो। फसल इस साल खराब हो गई। कर्ज बढ़ गया है बाईस हजार… मैंने तुझे तकलीफ देना नहीं चाहा।”
कबीर अंदर घुसा। चारपाई, टूटा स्टील का गिलास, रसोई में आधा बचा आटा। रात का खाना रोटी और प्याज की चटनी था। खाना खाते हुए कबीर ने साफ बात रख दी।
“मुझे पता है तुझे पैसे की जरूरत है। मैं पचास हजार तक दे सकता हूँ। लेकिन मुफ्त में नहीं।” उसने पैंट का जिप खोला। मोटा, लंबा, नसों वाला लंड बाहर निकल आया। “आज से तू मेरी माँ नहीं, मेरी रंडी बनेगी। मैं जब चाहूँ तेरी चूत मारूँगा। मुँह में दूँगा। गांड में डालूँगा। मना किया तो एक रुपया भी नहीं मिलेगा। और शहर जाकर सबको बताऊँगा कि मेरी माँ कितनी फटीचर है।”
रीमा का चेहरा सफेद पड़ गया। “कबीर… बेटा… पाप है ये… भगवान…”
“भगवान यहाँ नहीं है। पैसा है। फैसला तू कर। या तो ये लंड ले, या भूखी मर।”
रीमा देर तक रोती रही। फिर धीरे से सिर हिलाया। मजबूरी ने हरा दिया।
कबीर ने तुरंत घाघरा ऊपर कर दिया। नीचे कपड़ा नहीं था। माँ की घनी काली झाड़ियों वाली चूत खुली थी। उसने दो मोटी उंगलियाँ अंदर घुसा दीं। अंदर गरम और थोड़ा गीला था।
“देख, शरीर तो तैयार बैठा है।” उसने लंड का मोटा सिरा चूत के मुँह पर लगाया और एक जोरदार धक्के में आधा अंदर धंस दिया।
रीमा चिल्लाई। “आह्ह्ह… दर्द… कबीर… निकाल… बहुत मोटा है…”
कबीर ने और धक्का मारा। पूरा लंड अंदर चला गया। माँ की चूत उसके लंड को जकड़ रही थी। वह जोर-जोर से पेलने लगा। चारपाई की रस्सियाँ चरमरा रही थीं। रीमा के बड़े स्तन चोली के अंदर से बाहर आने को थे। कबीर ने चोली के बटन खोल दिए। भारी, लटकते स्तन बाहर आ गए। बड़े-बड़े गहरे रंग के निप्पल। उसने एक निप्पल मुँह में ले लिया और जोर से चूसने लगा, दाँत से काटते हुए।
“माँ की चूत कितनी गरम है… शहर की किसी रंडी ने इतना टाइट नहीं दबाया।” वह गंदी बातें बोलता गया। “आज से ये चूत सिर्फ मेरे लंड की है। रोज मरूँगा। सुबह, दोपहर, रात।”
रीमा रोते हुए भी हिलने लगी। दर्द के बीच अजीब सा मजा भी आने लगा था। कबीर ने उसके दोनों पैर अपने कंधों पर रख लिए और और गहराई तक पेलने लगा। थोड़ी देर बाद रीमा का शरीर अकड़ गया। वह काँपते हुए आ गई। उसकी चूत लंड को और कसकर जकड़ रही थी।
कबीर ने और तेज धक्के लगाए और गहरी तक जाकर अपना पूरा राइत माँ की कोख में उड़ेल दिया। इतना कि बाहर तक बहने लगा। उसने लंड निकाला। सफेद गाढ़ा वीर्य चूत से रिस रहा था। कबीर ने दो उंगलियों से उठाया और रीमा के मुँह पर लगा दिया।
“चाट। बेटे का वीर्य चाट। निगल जा।”
रीमा ने आँखें बंद कीं और जीभ निकालकर चाट लिया। कबीर ने बाकी लंड उसके मुँह में ठूंस दिया। “अब साफ कर। पूरा चूस।”
रीमा ने रोते हुए बेटे का लंड चूसा। पहली बार अपने ही बेटे का स्वाद लिया।
रात भर आराम नहीं मिला। कबीर ने एक घंटे बाद फिर से खड़ा कर लिया। इस बार उसने माँ को चारपाई पर घुटनों के बल कर दिया। पीछे से घाघरा ऊपर उठाया और फिर से चूत में घुसेड़ दिया। बाल पकड़कर जोर-जोर से झटके लगाने लगा। हर धक्के पर रीमा के स्तन लटक-लटके हिल रहे थे।
“जोर से बोल… माँ की चूत बेटे ने मारी…”
रीमा शर्म से मर रही थी लेकिन बोली, “माँ… की… चूत… बेटे ने… मारी…”
कबीर और उत्तेजित हो गया। उसने थूक लगाकर माँ की गांड के छेद पर लंड रगड़ा। रीमा डरी। “नहीं बेटा… वहाँ मत… फट जाएगी…”
“फटनी है तो फटे।” कबीर ने धीरे-धीरे दबाव डाला। आधा लंड गांड में चला गया। रीमा की चीख निकल गई। कबीर रुका नहीं। धीरे-धीरे पूरा अंदर कर लिया और फिर पेलने लगा। गांड इतनी टाइट थी कि उसे खुद भी मजा आ रहा था। आखिर में गांड के अंदर ही दूसरी बार राइत छोड़ दिया।
सुबह कबीर ने माँ को रसोई में पकड़ा। रीमा आटा गूँद रही थी। उसने पीछे से आकर घाघरा उठाया, लंड बाहर निकाला और खड़े-खड़े चूत में डाल दिया। आटा गूँदते हुए माँ की चूत मरवाई। एक हाथ से उसके स्तन मसलता रहा।
“आज से रोज की दिनचर्या है ये। जब तक मैं यहाँ हूँ, तेरी चूत खाली नहीं रहेगी।”
दोपहर को कबीर ने माँ को आम के पेड़ के नीचे ले जाया। दूर तक कोई नहीं था। उसने रीमा को नंगा किया। धूप में माँ का पूरा शरीर चमक रहा था। बड़े स्तन, चौड़ी कमर, मोटी गांड, और बीच में सूजी हुई चूत जिससे अभी भी वीर्य रिस रहा था। कबीर ने उसे लेटाया और घंटों चुदाई की। कभी ऊपर, कभी नीचे, कभी कुत्ते की तरह। रीमा कई बार आ गई। हर बार कबीर उससे बुलवाता—
“माँ की चूत बेटे ने मारी… बेटे ने मारी… पूरा भर दिया…”
शाम को कुएँ पर नहाने ले गया। नंगी रीमा पर पानी डालते हुए उसने फिर से लंड खड़ा किया। पानी की ठंडक में भी माँ की चूत गरम थी। उसने खड़े-खड़े फिर मारा। फिर माँ को कुएँ की जगत पर बैठाकर उसका मुँह अपने लंड पर लगाया। “चूस। अच्छे से। शहर जाऊँगा तो याद रहे।”
रात को चारपाई पर तीसरी बार। इस बार कबीर ने माँ को ऊपर बैठाया। रीमा खुद लंड पकड़कर अपनी चूत में बैठा रही थी। हिलने लगी। स्तन कबीर के चेहरे पर लग रहे थे। वह दोनों निप्पल मुँह में लेकर जोर-जोर से चूस रहा था।
“तेरे पति ने कभी इतना गहरा मारा था?”
रीमा ने हाँफते हुए कहा, “नहीं… तू बहुत बड़ा है… दर्द हो रहा है लेकिन… अंदर तक जा रहा है…”
कबीर ने उसके कूल्हे पकड़कर खुद ऊपर की तरफ जोर-जोर से धक्के लगाने शुरू किए। रीमा चीख रही थी। आखिर में दोनों लगभग साथ-साथ आए। कबीर का राइत फिर से माँ के अंदर समा गया।
अगले दिन वही सिलसिला। सुबह खेत की मेड़ पर। कबीर ने माँ को घोड़ी बना दिया। सूरज निकल रहा था। कभी-कभी दूर से गाँव का कोई आदमी दिख जाता। कबीर को परवाह नहीं थी। वह जोर-जोर से पेलता और रीमा से बुलवाता—
“जोर से चिल्ला… माँ की चूत बेटे ने मारी!”
रीमा शर्म के मारे मरती लेकिन मजबूरी और शरीर की आग में चिल्लाती, “माँ की चूत बेटे ने मारी… माँ की गांड बेटे ने फाड़ी… पूरा वीर्य अंदर छोड़ दिया…”
तीसरे दिन कबीर ने माँ को बाँधने की कोशिश की। रस्सी से हाथ बाँधकर चारपाई पर लिटाया और घंटों खेलता रहा। कभी चूत, कभी मुँह, कभी गांड। रीमा थक चुकी थी लेकिन शरीर अब विरोध कम कर रहा था। जब कबीर लंड उसके मुँह में ठूंसता तो वह अब खुद चूसने लगती।
चौथे दिन शाम को कबीर ने पैसा निकालकर रखा। पचास हजार की गड्डी। “ये ले। लेकिन याद रख… जब भी मैं आऊँगा, तेरी चूत मेरी रहेगी। शहर से फोन करूँगा तो तू तैयार रहना। और अगली बार गांड और भी ढीली करके रखना।”
रीमा पैसे लेते हुए रोई। लेकिन जब कबीर ने फिर से लंड बाहर निकाला तो उसने खुद ही घाघरा उठा लिया।
“मार ले बेटा… माँ की चूत फिर से मार ले…”
कबीर मुस्कुराया। उसने माँ को दीवार से लगाकर उठा लिया। जांघों के बल पकड़कर खड़े-खड़े जोरदार चुदाई शुरू कर दी। रीमा के स्तन उसके चेहरे पर पट-पट मार रहे थे। आखिरी राइत उसने फिर से माँ की कोख में ही छोड़ा।
रात को सोते समय कबीर ने माँ के स्तन को पकड़े रखा। “अब तू सिर्फ माँ नहीं रही। तू मेरी रखैल है। जयपुर का ये खेत अब मेरा चुदाईघर है।”
रीमा चुप चाप लेटी रही। जांघों के बीच से अभी भी बेटे का वीर्य रिस रहा था। दर्द था, शर्म थी, लेकिन अंदर कहीं एक भूख भी जाग चुकी थी।
अगली सुबह कबीर गाड़ी में बैठने से पहले माँ को आँगन में ही घोड़ी बनाकर आखिरी बार मारा। जोर से, बिना दया के। रीमा की चीखें खेत में गूँज रही थीं—
“माँ की चूत बेटे ने मारी… माँ की चूत बेटे ने मारी… अह्ह्ह… पूरा अंदर… माँ को अपनी रंडी बना लिया बेटे ने…”
कबीर ने राइत छोड़ने के बाद लंड माँ के मुँह में दे दिया। “साफ कर। और अगली बार आने तक याद रखना।”
रीमा ने बेटे का लंड चाटकर साफ किया। कबीर मुस्कुराता हुआ टैक्सी में बैठ गया। पीछे मिट्टी का मकान और एक माँ खड़ी थी जिसकी चूत और गांड अब बेटे की मिल्कियत बन चुकी थीं।


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